सामाजिक

80 के दशक से जब तुम लौटकर आना

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक तस्वीर बार-बार दिखाई दे रही है—आज का चेहरा, लेकिन 1980 के दशक का पहनावा, पुराना कैमरा, रेडियो, स्कूटर और घर का वह संसार, जिसे हमारी पीढ़ी ने जिया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमें कुछ क्षणों में चालीस वर्ष पीछे ले जा रही है। लोग इन तस्वीरों को देखकर मुस्कुरा रहे हैं, पुरानी यादें साझा कर रहे हैं और नई पीढ़ी को बता रहे हैं कि कभी जीवन ऐसा भी हुआ करता था। लेकिन इन तस्वीरों के पीछे एक बड़ा सवाल है—क्या हमें केवल उस दौर की तस्वीर चाहिए, या उसकी कुछ अच्छाइयाँ भी चाहिए? तस्वीर AI बना सकता है, लेकिन उसके भीतर की आत्मीयता, रिश्तों की गर्माहट, पड़ोस का भरोसा, मित्रता की निष्ठा, परिवार के लिए समय, बड़ों का सम्मान, किताबों का प्रेम, प्रतीक्षा का धैर्य और बिना स्वार्थ किसी के काम आने की आदत कोई मशीन नहीं बना सकती। इसलिए मन कहता है—“80 के दशक से जब तुम लौटकर आना, कुछ अच्छा तुम ज़रूर वहाँ से लेकर आना।”

यह कहना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा कि 80 का दशक कोई आदर्श युग था। उस समय गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव और लैंगिक विषमता जैसी गंभीर समस्याएँ थीं। सुविधाएँ सीमित थीं और तकनीकी विकास आज की तुलना में बहुत पीछे था। इसलिए अतीत को स्वर्णयुग बनाकर देखना उचित नहीं। लेकिन उसकी अच्छाइयों को पहचानना भी जरूरी है। कम साधनों के बीच रिश्तों के लिए समय था, बातचीत के लिए जगह थी, पड़ोसी के लिए दरवाजा खुला था और परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि एक-दूसरे की जिम्मेदारी का नाम था। आज स्मार्टफोन, इंटरनेट और मनोरंजन के अनगिनत साधन हैं, फिर भी अक्सर सबसे दुर्लभ चीज समय है। हमें अतीत की असुविधाएँ नहीं, उसकी मानवीय संपदा वापस लानी है।

उस समय चिट्ठी केवल कागज नहीं, भावनाओं का संसार होती थी। किसी अपने के पत्र आने की प्रतीक्षा होती थी। आज संदेश कुछ सेकंड में दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँच जाता है, लेकिन कई बार संवाद मन तक नहीं पहुँचता। हमारे पास हजारों डिजिटल संपर्क हैं, फिर भी किसी की बात ध्यान से सुनने का समय कम है। इसलिए चिट्ठियाँ वापस लाने की जरूरत नहीं; चिट्ठियों की संवेदना वापस लानी है। किसी को उत्तर देना, किसी के दुख में बैठना, किसी की खुशी में शामिल होना और “कैसे हो?” पूछकर सचमुच उसका हाल जानना फिर हमारी सामाजिक आदत बनना चाहिए।

80 के दशक का मोहल्ला आज के समाज के लिए भी एक बड़ी सीख है। किसी घर में शादी हो तो पड़ोसी काम में हाथ बँटाते थे; बीमारी में हाल पूछने पहुँचते थे; शाम को गलियाँ बच्चों की आवाजों से भरती थीं और बरामदों या बैठकों में बातचीत चलती थी। आज ऊँची इमारतों में लोग एक-दूसरे के बहुत करीब रहते हुए भी सामाजिक रूप से दूर हो सकते हैं। सोशल मीडिया ने हमें दुनिया से जोड़ दिया है, लेकिन पड़ोसी से परिचय जरूरी नहीं रहा। इसलिए पुराने मकान नहीं, मोहल्ले वाली मनुष्यता लौटनी चाहिए—वह भावना जिसमें दूसरे की परेशानी देखकर पूछा जाता था, “कुछ मदद चाहिए?”

उस दौर का बचपन भी याद करने योग्य है। बच्चे साइकिल चलाते, पतंग उड़ाते, कंचे खेलते, क्रिकेट खेलते और शाम तक गलियों में दौड़ते थे। मनोरंजन की स्क्रीन सीमित थीं, लेकिन कल्पना की दुनिया बड़ी थी। आज डिजिटल तकनीक बच्चों के लिए ज्ञान और रचनात्मकता के असाधारण अवसर लेकर आई है। हमें इसे रोकना नहीं, संतुलित करना है। बच्चे ऑनलाइन दुनिया से सीखें, लेकिन मैदान में खेलें; वीडियो देखें, लेकिन किताब भी पढ़ें; तकनीक का उपयोग करें, लेकिन प्रकृति और परिवार से संबंध न टूटे। 80 के दशक से हमें तकनीक-विहीन बचपन नहीं, बल्कि जीवन से जुड़ा बचपन वापस लाना है।

उस समय चीजें टूटती थीं तो उन्हें फेंकने से पहले ठीक कराने की कोशिश होती थी। कपड़े लंबे समय तक चलते थे, किताबें एक बच्चे से दूसरे तक पहुँचती थीं और सीमित साधनों में भी उत्सव मनाए जाते थे। आज बाजार लगातार बताता है कि जो हमारे पास है, वह पर्याप्त नहीं है। 80 के दशक से हमें उसकी अर्थव्यवस्था नहीं, उसकी मानसिकता चाहिए—बचत, पुनः उपयोग, मरम्मत, सादगी और संतोष। मनोरंजन में भी प्रतीक्षा का अपना आनंद था। रेडियो या दूरदर्शन के कार्यक्रम पूरे परिवार को एक साथ बैठाते थे। आज विकल्प अनगिनत हैं, लेकिन हर व्यक्ति अपनी अलग स्क्रीन में बंद हो सकता है। हमें पुराना रेडियो नहीं, साझा अनुभव और बातचीत की संस्कृति वापस चाहिए।

बड़ों का सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह, शिक्षक के प्रति आदर, अतिथि का स्वागत, मित्रता में निष्ठा, वचन का महत्व, जरूरतमंद की सहायता, सार्वजनिक संपत्ति के प्रति जिम्मेदारी, भाषा में शालीनता और असहमति के बावजूद दूसरे व्यक्ति का सम्मान—ये किसी एक दशक की संपत्ति नहीं, समाज की स्थायी पूँजी हैं। स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी, अभिव्यक्ति के साथ मर्यादा, प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग और सफलता के साथ संवेदना भी चाहिए। 80 के दशक की अच्छी सामाजिक आदतों को आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ जोड़ना ही सार्थक वापसी होगी।

राजनीति और सार्वजनिक जीवन में भी इस स्मृति का अर्थ तस्वीरों से बड़ा है। हमें पुराने नेताओं के चेहरे भर वापस नहीं चाहिए। हमें नेताओं, समाज सुधारकों, स्वतंत्रता सेनानियों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों, साहित्यकारों और अन्य महापुरुषों के जीवन से अध्ययन, अनुशासन, जनसेवा, जवाबदेही, त्याग, विचारशीलता और संस्थाओं के प्रति सम्मान जैसे गुण ग्रहण करने चाहिए। विचारों और निर्णयों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उनकी स्मृति का उपयोग वर्तमान जीवन में उपयोगी मूल्यों को उतारने के लिए होना चाहिए। केवल मूर्तियाँ, पोस्टर और जयंती समारोह पर्याप्त नहीं; उनके विचारों पर गंभीर अध्ययन, संवाद और व्यवहार में उनका परीक्षण भी जरूरी है।

पत्रकारिता को भी अतीत से सीखना चाहिए। आज खबर की गति अभूतपूर्व है, लेकिन गति सत्य की गारंटी नहीं है। गलत सूचना, कृत्रिम तस्वीरें, नकली आवाजें और निर्मित वीडियो पत्रकारिता की जिम्मेदारी बढ़ाते हैं। इसलिए तथ्य की पुष्टि, स्रोतों की विश्वसनीयता, भाषा की गरिमा और समाचार तथा टिप्पणी के बीच स्पष्ट अंतर की संस्कृति मजबूत करनी होगी। पत्रकारिता का सबसे बड़ा धन पाठक का विश्वास है। शिक्षा में भी यही संतुलन जरूरी है। ऑनलाइन पाठ्यक्रम, डिजिटल पुस्तकालय और AI ने सीखने की सीमाएँ विस्तृत कर दी हैं, लेकिन पढ़ना, प्रश्न करना, तर्क करना, संदर्भ समझना, शिक्षक से संवाद करना और स्वयं सीखना आज भी ज्ञान की बुनियादी आदतें हैं। हमें किताबों के प्रति प्रेम और अध्ययन का अनुशासन वापस लाना होगा।

इसलिए “80 के दशक से लौटकर आना” अतीत में लौटने का निमंत्रण नहीं है। हमें न पुरानी असुविधाएँ चाहिएं, न उस समय की सामाजिक कमियाँ और न तकनीकी सीमाएँ। हमें आधुनिक, वैज्ञानिक, डिजिटल और वैश्विक भारत चाहिए, लेकिन ऐसा भारत जिसमें तकनीक के साथ संवेदना, विकास के साथ न्याय, स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी, प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग और समृद्धि के साथ संतोष हो। हमें ऐसा परिवार चाहिए जिसमें हर व्यक्ति अपनी स्क्रीन में कैद न हो; ऐसा समाज चाहिए जिसमें पड़ोसी अपरिचित न हो; ऐसा सार्वजनिक जीवन चाहिए जिसमें सेवा और जवाबदेही जीवित रहे; ऐसी पत्रकारिता चाहिए जिसमें विश्वसनीयता गति से अधिक महत्वपूर्ण हो; और ऐसी शिक्षा चाहिए जिसमें ज्ञान के साथ मनुष्यता भी विकसित हो।

अगली बार जब सोशल मीडिया पर 80 के दशक की कोई तस्वीर दिखाई दे, तो केवल पुराने कपड़े, रेडियो, स्कूटर या कैमरे को देखकर न मुस्कुराएँ। कुछ क्षण रुककर पूछें—उस तस्वीर में ऐसा क्या है जिसकी आज हमें जरूरत है? यदि कुछ अच्छा था तो उसे अतीत की अलमारी में बंद क्यों रखा जाए? हमें 80 का दशक नहीं चाहिए; हमें उस दौर की अच्छी मानवीय आत्मा और आज की आधुनिक वैज्ञानिक शक्ति का संगम चाहिए। यदि AI हमारी तस्वीर को चालीस वर्ष पीछे ले जा सकता है, तो हमारी बुद्धिमत्ता और संवेदना उस दौर की अच्छाइयों को भविष्य में क्यों नहीं ले जा सकती?

80 के दशक से जब तुम लौटकर आना
कोई भूली हुई अच्छी आदतें साथ लाना।
रिश्तों में थोड़ी गर्मी, बातों में थोड़ी मिठास
और उस समय का सच्चा इंसान साथ लाना।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563

Leave a Reply