कविता

बदलता समाज

विधा- कविता
शीर्षक- बदलता समाज

बदलता हुआ समय है, बदलता समाज है,
जैसा समाज कल था वैसा नहीं रहा आज है,
संस्कार बदल गए, रीतियां भी बदल गईं,
कुछ भी कर लो, पहन लो, कह दो कि रिवाज है!

चेहरे पर मुस्काने हैं दिल में मगर बवाल हैं,
ऊपर से शहद-से मीठे, अंदर से कड़वे कमाल हैं,
मुखौटों की कमी नहीं, जितने-जैसे चाहो लगा लो,
चिपके हुए हैं सब मोबाइल में, बुजुर्ग अकेल्रे बेहाल हैं!

रिश्तों में अब पहले सी वो गर्मी कहाँ रही है,
कोई किसी की नहीं सुनता, सबने अपनी ही कही है,
सच बोलना कठिन हुआ, झूठों का हुआ बोलबाला,
शुक्र है अब भी सुधरने की कुछ तो उम्मीद बाकी रही है!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

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