कहानी

एक अधूरा सपना

अलमारी के ऊपरी खाने में रखी लाल साड़ी को सविता ने आज फिर बाहर निकाल लिया।
सुनहरी जरी की महीन बेलें अब भी चमक रही थीं। बीस वर्ष पुरानी साड़ी में समय की हल्की गंध बस गई थी, लेकिन उसकी चमक जैसे अब भी किसी प्रतीक्षा में थी।
सविता ने साड़ी को अपने सीने से लगाया और आईने के सामने खड़ी हो गई। चेहरे पर झुर्रियाँ थीं। बालों में चाँदी उतर आई थी। लेकिन आँखों में वही पच्चीस वर्ष की लड़की थी, जिसने साड़ी खरीदते समय दुकानदार से कहा था— “इसे सँभालकर रखना भैया, किसी खास दिन पहनूँगी।” वह खास दिन कभी नहीं आया।
विवाह के बाद सविता विद्यालय में पढ़ाना चाहती थी। बी.एड. की डिग्री उसके हाथ में थी और मन में बच्चों के बीच रहने का उत्साह। फिर सास की बीमारी, घर की जिम्मेदारियाँ, बच्चों की परवरिश… हर बार नौकरी का विचार थोड़ा और पीछे चला जाता।
एक दिन उसने अपनी डिग्री और प्रमाणपत्रों की फाइल अलमारी में रख दी। लाल साड़ी भी उसी खाने में चली गई। “अभी नहीं… बाद में।” बस, इतना ही कहा था उसने। और वह ‘बाद में’ बीस वर्ष लंबा हो गया।
“माँ!” नंदिनी की आवाज से वह चौंकी। “फिर वही साड़ी?”
सविता मुस्करा दी। “कुछ चीजें पुरानी होकर भी पुरानी नहीं होतीं।” नंदिनी ने अलमारी में झाँका। तभी उसकी नजर पुरानी फाइल पर पड़ी। “यह क्या है?”
सविता ने फाइल निकाल ली। बी.एड. की डिग्री देखते हुए नंदिनी कुछ देर चुप रही। “आपने पढ़ाया क्यों नहीं?” सविता ने कागजों को धीरे से समेटते हुए कहा— “हर रास्ता अपने समय पर नहीं मिलता बेटी।”
नंदिनी ने माँ की ओर देखा। उस दिन उसने कुछ नहीं कहा। कुछ दिनों बाद उसने अपनी नौकरी छोड़ने का निर्णय लिया। “मैं गाँव में लड़कियों के लिए स्कूल खोलना चाहती हूँ।”
सविता ने उसे देर तक देखा। “आसान नहीं होगा।” “मालूम है।” “पैसे?” “कम हैं।”
सविता भीतर गई। वर्षों से सँभालकर रखी अपनी बचत की पेटी उठा लाई। “तो शुरुआत छोटी होगी।”
कुछ महीनों बाद गाँव के पुराने पंचायत भवन के एक कमरे में दस बच्चियाँ पढ़ रही थीं। दरवाजे पर एक छोटी-सी पट्टिका लगी थी— ‘उड़ान — बालिका शिक्षा केंद्र’ उद्घाटन के दिन सविता ने वही लाल साड़ी पहनी। नंदिनी ने उसे देखकर कहा— “माँ, आज तो सच में आपका खास दिन है।” सविता ने केवल मुस्कराकर उसकी ओर देखा।
फीता काटने का समय आया तो नंदिनी ने कैंची सविता की ओर बढ़ा दी। “आप काटिए।” सविता ने कैंची हाथ में ली, फिर सामने बैठी बच्चियों को देखा और नंदिनी को लौटा दी। “तुम काटो।” नंदिनी ने फीता काट दिया। तालियाँ गूँज उठीं।
सविता कुछ देर बच्चियों को देखती रही। फिर कमरे के कोने में रखी छोटी-सी अलमारी के पास गई। उसने साड़ी बदली और लाल साड़ी तह लगाकर अलमारी में रख दी । “माँ, इसे यहाँ क्यों?” सविता ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने अपनी पुरानी फाइल खोली और बी.एड. की डिग्री भी साड़ी के नीचे रख दी। नंदिनी की आँखें भर आईं।
सविता ने अलमारी बंद की और बच्चियों के बीच जाकर बैठ गई। एक बच्ची अपनी कॉपी में कुछ लिख रही थी। सविता ने पूछा— “क्या लिख रही हो?”
बच्ची ने कॉपी उसकी ओर बढ़ा दी। ऊपर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था— “मैं बड़ी होकर अध्यापिका बनूँगी।” सविता ने कुछ नहीं कहा। बस बच्ची के सिर पर हाथ रख दिया।
अलमारी के भीतर लाल साड़ी शांत थी। उसके नीचे रखी बी.एड. की डिग्री भी। पर इस बार सपने को वहाँ कैद नहीं किया गया था।

— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016

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