कुछ रिश्ते खून से नहीं बनते
इंदौर की झुग्गी बस्ती में असामान्य तेज़ बारिश हो रही थी। जलवायु परिवर्तन ने मौसम चक्र बदल दिया था। पैंतालीस वर्षीय रमेश अकेला रहता था; पत्नी के जाने के बाद घर में पुरानी कुर्सी और यादें थीं। बगल में तीस वर्षीय संध्या छोटे बेटे के साथ रहती थी। दोनों कभी बात नहीं करते थे, सिर्फ दीवार के पार खाँसी सुनाई देती थी। रात तीन बजे पानी कमरे में घुस आया। रमेश ने देखा, संध्या बच्चे को गोद में लिए पानी में काँप रही थी। उसने अपना एकमात्र सूखा कम्बल बच्चे पर डाल दिया। फिर दोनों ने सामान ऊँचा रखा। सवेरा होते-होते पानी थम गया। सविता ने कहा, “शुक्रिया…” रमेश सिर हिलाकर लौट गया।
अगले दिन संध्या उसके दरवाज़े पर गरम चाय रख गई और तीसरे दिन रमेश ने बच्चे के लिए दो बिस्कुट छोड़ दिए। बिना बातचीत या वादे के धीरे-धीरे नया रिश्ता बन गया—शब्दों से परे, जरूरत से भरा। संध्या रात की शिफ्ट पर जाती तो रमेश बच्चे को कहानी सुनाता; रमेश बीमार पड़ता तो संध्या दवाई लाती। एक शाम बच्चे ने पूछा, “मम्मी, अंकल हमारे परिवार हैं क्या?” संध्या मुस्कुराई, “हाँ बेटा… कुछ रिश्ते खून से नहीं, बरसात की रातों और चुपके से दिए कम्बल से बनते हैं।” रमेश ने सुना तो आँखें भर आईं। उसने महसूस किया—अकेलापन बड़ा सत्य है, लेकिन दो टूटे लोग एक-दूसरे का सहारा बनें तो नया, कोमल और स्थायी रिश्ता जन्म लेता है।
— कृति आरके जैन
