लिख दी अपनी जीत
काँटे जितने बढ़ गए, उतना बढ़ा जुनून।
मंजिल चाहे दूर थी, मन में रहा सुकून।।
ठोकर देकर सोचते, अब टूटेगा आज।
गिरकर फिर उठता रहा, यह मेरा अंदाज।।
आँधी मुझको देखकर, करती रही सवाल।
मैं तूफानों में खड़ा, बनकर रहा मशाल।।
राह कठिन थी सामने, रुकना कब थी रीत?
पत्थर को भी चीरकर, लिख दी अपनी जीत।।
दुनिया ने जब रोकना, चाहा मेरी चाल।
मैंने अपनी चाल से, बदल दिया हर हाल।।
किस्मत को दोषी कहें, ऐसे लोग हजार।
मैंने कर्मों से लिखा, अपना नव संसार।।
हर ठोकर ने कह दिया, मत होना लाचार।
जिसने खुद को जीत लिया, जीता ये संसार।।
राह रोकने वो चले, लेकर झूठी शान।
मैंने मेहनत से लिखा, अपना नया विधान।।
जो कल तक थे साथ में, आज बने अनजान।
वक्त बदलते देर क्या, खुल जाती पहचान।।
मोड़ बहुत आए मगर, बदली नहीं उड़ान।
अपनी राह खुद चला, यह मेरी पहचान।।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
