कहानी

उसका ज़ब्त (सबर) टूट गया

कश्मीर की सर्द हवाओं में चिनार के शुष्क पत्ते तैर रहे थे। दस साल दस लंबे और तवील साल ज़ोहरा और अयाज़ ने एक-दूसरे के बिना गुज़ारे थे। स्कूल और कॉलेज की मासूम मोहब्बत, जो भारी-भरकम किताबों, फ़लसफ़े के लेक्चर्स, रातों की उड़ी हुई नींदों और ख़त-किताबत से परवान चढ़ी थी, ज़माने की निगहबानी का शिकार हो गई थी।
​मगर इश्क़ की तासीर भी अजब होती है,यह कोई अचानक हुआ हादसा नहीं, बल्कि ख़ामोशी से रूह में उतरने वाली धड़कन है।
​यादों के दरीचे खुले तो वही पहला दिन नज़र के सामने तैर गया। लाइब्रेरी की उस सर्द सी दोपहर में, जब अलमारी से किताब निकालते हुए अयाज़ की उँगलियाँ ज़ोहरा की उँगलियों से छुई थीं। नज़रें उठीं, आँखें मिलीं और ज़माने की आवाज़ें जैसे ठहर गईं। पलकों की हल्की सी कसमसाहट में एक अनजाना सा दीदार था, जिसमें न कोई साज़ था न आवाज़, मगर दोनों के सीने में दिल ज़ोर से धड़क उठा था।
​वह महज़ एक नज़र का मिलना नहीं था,वह तो दो रूहों का आपस में गवाह बनना था। उस दिन के बाद से ज़ोहरा की रातों की नींद में अयाज़ का तसव्वुर आ बसा था, और अयाज़ की हर फ़लसफ़े की किताब के पन्नों पर ज़ोहरा का चेहरा उभरने लगा था। दिल के किसी कोने में कुछ-कुछ होने का यह सिलसिला, देखते ही देखते इश्क़ की मुकम्मल वादी बन गया।
हक़ीक़त यह थी कि जुदाई सिर्फ़ फ़ासलों की नहीं, बल्कि ‘अना’ (इगो)मजबूरी और ख़ानदान के दिए ज़ख़्मों की थी। ज़ोहरा के ख़ानदान वालों ने उस पर ऐसी क़समों और पाबंदियों के ताले जड़ दिए थे कि उसकी ख़ामोशी ही अयाज़ की सलामती की ज़मानत बन गई थी। दूसरी तरफ़ अयाज़, ज़ोहरा की उस अचानक ख़ामोशी को उसकी रज़ा (मर्ज़ी) समझ बैठा था। मोहब्बत में जब शिद्दत हद से बढ़ जाए, तो कभी-कभी इंसान सवाल पूछना छोड़ देता है और तन्हाई को ही अपना मुक़द्दर मान लेता है।
इन दस सालों में अयाज़ वादी छोड़कर दिल्ली चला गया था। उसने आकिटेक्चर की दुनिया में नाम कमाया, मगर उसका दिल वहीं क़श्मीरी पहाड़ियों में अटका रहा। वह बेमक़सद जीता रहा, उसकी रातें वही पुरानी अधूरी किताबों और ज़ोहरा के पुराने ख़तों को दोबारा पढ़ने में गुज़रतीं।
और ज़ोहरा? ज़ोहरा कहीं खोई नहीं थी। उसने अपनी ज़ात को टूटने नहीं दिया। उसने तालीम मुकम्मल की और कश्मीर के दूर-दराज़ पहाड़ी इलाक़े (गुलमर्ग के ऊपरी गाँव) में एक आर्कियोलॉजिस्ट और तारीख़ी दस्तावेज़ों की शोधकर्ता के तौर पर सरकारी खिदमत ज्वाइन कर ली।
वो ख़ामोश लकड़ी की हवेली, जो पहाड़ियों के मोड़ पर खड़ी थी, दरअसल कोई आम घर नहीं था। वह ‘फ़ॉरेस्ट एंड हेरिटेज रेस्ट हाउस’ की एक कदीम (पुरानी) इमारत थी, जहाँ ज़ोहरा अपने रिसर्च प्रोजेक्ट्स के सिलसिले में तन्हा रहा करती थी। उसने दुनियावी भीड़-भाड़ से दूर, पहाड़ियों की ख़ामोशी में अपनी तन्हाई को अपनी इबादत बना लिया था।
ज़ोहरा को जब अपने हेरिटेज प्रोजेक्ट के दौरान वादी के एक पुराने नक़्शे और कदीम दस्तावेज़ में अयाज़ का नाम और उसकी पुरानी किताब का ज़िक्र मिला, तो उसका ज़ब्त (सबर) टूट गया। उसे अहसास हुआ कि अयाज़ ने कभी शादी नहीं की और वह आज भी उसी मोड़ पर खड़ा है।
ज़ोहरा ने अपने महकमे के एक डाक-कर्मचारी के ज़रिए वह रहस्यमयी पार्सल पुरानी पीतल की चाबी, स्क्रॉल और आख़िरी पैग़ाम अयाज़ तक पहुँचाया। वह पैग़ाम कोई खेल नहीं, बल्कि दस सालों की ख़ामोशी का कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) था।
जब अयाज़ उस पुरानी ओपन-टॉप जीप में, बोनट पर मोहब्बत के तमाम साज़-ओ-सामान (किताबें, नक़्शे, ख़त) सजाकर हवेली के सामने पहुँचा, तो ज़ोहरा मैरून साड़ी में मलबूस (सजी हुई) वहीं खड़ी थी।
अयाज़ ने जीप रोकी, अपना चश्मा नीचे किया और भारी आवाज़ में पूछा, “तुम इतने साल कहाँ थीं, ज़ोहरा? और मुझे तलाश क्यों नहीं किया?”
ज़ोहरा की आँखों में आँसू छलक आए, उसने मद्धम लहजे में जवाब दिया, “मैं यहीं थी अयाज़… इन क़दीम पत्थरों और किताबों के बीच, सरकारी कागज़ात में अपनी तन्हाई का हिसाब लिख रही थी। मैंने तुम्हें इसलिए तलाश नहीं किया क्योंकि मैं चाहती थी कि जब हम मिलें, तो ज़माने का कोई ख़ौफ़ न हो। यह हवेली, यह वादियाँ मेरी ख़िदमत का हिस्सा थीं, मगर मेरा दिल सिर्फ़ तुम्हारी राह तक रहा था।”वो काफी समय तक वाहन रुके, फ़िर
अयाज़ ने मुस्कुराकर जीप का दरवाज़ा खोला। ज़ोहरा आकर उसके बराबर में बैठ गई।
उनकी मंज़िल अब कोई शहर, कोई बंदिश या कोई ख़ानदानी ज़ंजीर नहीं थी। वे ‘लद्दाख़ की सरहद’ के पास बसी उस नई ‘हेरिटेज साइट’ और ‘रिसर्च कॉटेज’ की तरफ़ बढ़ रहे थे, जहाँ ज़ोहरा का नया तबादला हुआ था। वे एक ऐसी दुनिया की तरफ़ जा रहे थे जहाँ सिर्फ़ कुदरत, फ़लसफ़ा, किताबें और उनका अटूट साथ था।
जीप के बोनट पर रखे उस क़दीम पन्नों पर शाम की आफ़ताब (सूरज) की सुनहरी किरणें चमक रही थीं, जिस पर लिखा था,
कहानी यहाँ ख़त्म नहीं हुई… यह तो मोहब्बत की उस किताब का नया सफ़ा है, जिसके पन्ने लामहदूद हैं।”
​दस बरस की लम्बी रंगत, इंतज़ार और तन्हाई के बाद, हवा में आज एक अजीब सा सुकून था। अयाज़ ने स्टीयरिंग व्हील पर अपनी पकड़ मज़बूत की, एक्सीलेटर दबाया और ज़ोहरा की तरफ़ देखकर मुस्कुराया।
​”हमारी इब्तिदा कश्मीरी वादियों की ठंडी हवाओं में हुई थी ज़ोहरा… और अब हमारी इंतहा इस क़ायनात की आख़िरी सरहद होगी।”
​ज़ोहरा ने बिना कुछ कहे अपनी आँखें मूँद लीं और अयाज़ के कंधे पर अपना सर टिका दिया। दस साल का दर्द पल भर में पिघल गया। जीप पहाड़ियों के मोड़ दर मोड़, उस असीमित रास्ते पर आगे बढ़ती चली गई,जहाँ अब न कोई बंदिश थी, और न जुदाई का कोई साया।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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