गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

होती है तकरार उन्हीं से।
लेते हैं उपहार उन्हीं से।।

लड़ना जिसने देख सिखाया।
सीख लिया इज़हार उन्हीं से।

घूँट रहे पीते सुन लो तुम।
फिर करते इक़रार उन्हीं से।।

बचपन से देख जवानी तक।
होतीं आँखें चार उन्हीं से।

रोएँ चाहें जितना भी हम तो।
मिलता रोज़ करार उन्हीं से।

बंदिश अब तलक देख नहीं।
खुश मेरा संसार उन्हीं से।।

उनके बिन लगता सूना-सूना।
महके यह घर-बार उन्हीं से।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’

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