ग़ज़ल
इतना ऊँचा पद है भाई
फ़िर भी नीचा कद है भाई
नाटक पर रोने का नाटक
ये गिरने की हद है भाई
देख यही मारेगा तुझको
ये जो तेरा मद है भाई
चीज उधारी मिल जायेगी
लेकिन प्रेम नकद है भाई
कुंठाओं की ताली हैं ये
जिन पर तू गदगद है भाई
जिससे मिलना हो मिलता है
दिल की क्या सरहद है भाई
इसको तप ही सुन पाएगा
सच का स्वर अनहद है भाई
— सतीश बंसल
