कविता

जड़ों का ऋण

पितर
हमारे पीछे छूट गया हुआ समय नहीं,
वे उस वृक्ष की जड़ें हैं
जिसकी शाखाओं पर
हम अपना वर्तमान टँगा हुआ देखते हैं।

जड़ें दिखाई नहीं देतीं,
फिर भी वृक्ष का प्रत्येक पत्ता
उनकी मौन उपस्थिति से
हरा होता है।

हम अक्सर
अपने होने का श्रेय
अपनी शाखाओं को दे देते हैं—
अपनी उपलब्धियों को,
अपने निर्णयों को,
अपने समय को;

भूल जाते हैं
कि शाखाएँ जितनी ऊपर जाती हैं,
उनका ऋण उतना ही नीचे
अँधेरे में उतरता जाता है।

पितरों ने
हमें केवल जन्म नहीं दिया,
उन्होंने उस मिट्टी को
अपनी देह और श्रम से सींचा
जिसमें हमारे होने की
पहली जड़ें फूटी थीं।

उनके हाथों की कठोरता
आज हमारी हथेलियों में नहीं,
हमारे धैर्य में बची है।

उनकी असफलताएँ
किसी पुराने मौसम की तरह
बीती नहीं हैं;
वे हमारी जड़ों में
सावधानी बनकर उतरी हैं।

उनके अधूरे स्वप्न
शायद फूल नहीं बन सके,
पर उन्होंने मिट्टी को
इतना उर्वर अवश्य किया
कि हम अपने सपनों को
आकाश तक ले जा सकें।

इसलिए
पितरों को स्मरण करना
केवल पीछे मुड़कर देखना नहीं है।

यह अपनी जड़ों तक
एक बार फिर उतरना है—
यह जानने के लिए
कि हम किस मिट्टी से बने हैं
और उस मिट्टी का
हम पर कितना ऋण है।

श्राद्ध में अर्पित
एक मुट्ठी अन्न से अधिक
शायद उन्हें यह स्वीकार चाहिए
कि हम वृक्ष होकर
अपनी जड़ों को विस्मृत नहीं करेंगे।

हम बढ़ेंगे,
बहुत ऊपर तक बढ़ेंगे,
अपनी शाखाएँ
नए आकाशों तक फैलाएँगे—

पर जड़ों से
अपना संबंध नहीं तोड़ेंगे।

क्योंकि वृक्ष की ऊँचाई
उसकी जड़ों से अलग नहीं होती।

और हमारी पहचान भी
हमसे पहले जी गई
उन पीढ़ियों के बिना
पूर्ण नहीं होती।

पितर—
हमारे अतीत में दबे हुए नाम नहीं,
हमारे वर्तमान को थामे
वह अदृश्य आधार हैं
जिससे होकर
हमारा भविष्य जन्म लेता है।

— मंजूषा श्रीवास्तव ‘मृदुल’

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016

Leave a Reply