रेत नहीं पर्वत बनूँ
आँधी लेकर आ गए, सोच लिया अब हार।
रेत नहीं पर्वत बनूँ, सह लूँ सभी प्रहार॥
तूफानों से कह दिया, मत करना अभिमान।
झुकना फितरत है नहीं, अडिग रहे सम्मान॥
पाँवों में काँटे चुभे, हुए लहूलुहान।
फिर भी चलते ही रहूँ, लेकर दृढ़ अरमान॥
धूप बहुत दिखला चुके, माँगूँ अब ना छाँव।
जीवन स्वयम् सँवार लूँ, अपने श्रम की छाँव॥
समझा जिसने कम मुझे, उसका कैसा मान।
वक्त बताएगा उसे, किसमें कितनी जान॥
मुझको रोकें आँधियाँ, मुझको रोकें रात।
हिम्मत जिसके साथ हो, देता सबको मात॥
लहरें समझे नाव को, डूबेगी हर बार।
किन्तु किनारे जा लगी, लेकर दृढ़ पतवार॥
मिट्टी समझ न खेलना, मुझमें भी अंगार।
चुप हूँ तो यह मत समझ, सह लूँ सभी प्रहार॥
तूफानों की गोद में, पलता है स्वाभिमान।
गिरकर फिर से उठ चलूँ, यह मेरी पहचान॥
बादल चाहे घेर लें, चाहे बरसे नीर।
सूरज बनकर फिर उठूँ, लेकर नई लकीर॥
कमजोरी मत आँकिए, खामोशी को देख।
शब्द नहीं जब बोलते, कर्म लिखेगा लेख॥
जितना मुझको तोड़ते, उतना बनूँ मजबूत।
चोटों ने ही है गढ़े, सच्चे वीर सपूत॥
राह कठिन हो सामने, कदम न होंगे मंद।
मन में यदि विश्वास हो, जीत सके हर द्वंद्व॥
रेत समझकर पाँव से, मत करना अपमान।
मरु स्थल भी दे सके, आँधी का तूफान॥
जिसने समझा अंत है, उसको हो ये ज्ञान।
एक अंत के बाद ही, शुरू नया अभियान॥
आप चलाते जाइए, अपनी सारी चाल।
सच की नींव खड़ी रहे, सौरभ ये हर हाल॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
