कुछ रास्ते छूट जाते हैं, कुछ लोग नहीं : स्मृतियाँ डायरी के पन्नों से
जीवन में कुछ पड़ाव ऐसे होते हैं, जिन्हें हम पीछे छोड़ तो आते हैं, लेकिन वे कभी हमारे भीतर से पीछे नहीं छूटते। समय आगे बढ़ता रहता है, हम अपनी-अपनी राहों पर निकल जाते हैं, नए लोग मिलते हैं, नई जिम्मेदारियाँ आती हैं; फिर भी अतीत का कोई एक कोना ऐसा होता है, जहाँ मन बार-बार लौटता है।
मेरे जीवन में ऐसा ही एक पड़ाव था—एनआईएमएच, कोलकाता।
यह कहानी वर्ष 2008-09 के आसपास की है।
अपनी तकनीकी शिक्षा पूरी करने के बाद मुझे कुछ समय तक ऐसा लगा कि जिस दिशा में मैंआगे बढ़ना चाहता हूँ, उसके लिए कोई उचित मंच नहीं मिल पा रहा है। परिवार के लोगों ने सलाह दी कि अब कुछ अलग सोचना चाहिए। उस समय मेरे राज्य में शिक्षक नियुक्तियों का दौर भी चल रहा था। इसलिए मैंने शिक्षक बनने की दिशा में आगे बढ़ने का निर्णय लिया।
बी.एड. प्रवेश परीक्षा के लिए मैंने लगभग पाँच-छह विश्वविद्यालयों के फॉर्म भरे। संयोग से सभी विश्वविद्यालय मेरे गृह राज्य से बाहर थे। परीक्षाएँ देने के लिए अलग-अलग जगहों की यात्राएँ करनी पड़ीं। सबसे पहले परिणाम आया एनआईएमएच का—National Institute for the Mentally Handicapped, जो उस समय West Bengal State University, Barasat से संबद्ध था। वहाँ B.Ed. (Special Education) में मेरा चयन हो गया।
लेकिन मेरे लिए यह निर्णय इतना आसान नहीं था।
बड़े भाई ने साफ कहा— “यह बहुत कठिन कोर्स है और पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से होगी। तुमसे नहीं हो पाएगी।”
शायद उस समय उनकी बात में चिंता अधिक थी, विश्वास की कमी नहीं। लेकिन मैंने दाखिला ले लिया। मुझे क्या पता था कि आने वाले कुछ महीने मेरे जीवन की सबसे कठिन, लेकिन सबसे शिक्षाप्रद यात्राओं में से एक बनने वाले हैं।
जब अंग्रेजी मेरे सामने एक दीवार बनकर खड़ी हो गई
B.Ed. Special Education का पाठ्यक्रम विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास से जुड़ा था। विषय अपने आप में नया और रोचक था, लेकिन मेरे सामने सबसे बड़ी समस्या विषय नहीं, भाषा थी। मैंने अपनी पूरी शिक्षा हिंदी माध्यम से प्राप्त की थी। स्थिति यह थी कि उस समय मैं अंग्रेजी में ठीक से छुट्टी का आवेदन तक नहीं लिख पाता था। ऐसे में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई करना मेरे लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। कॉलेज में पढ़ाने वाले शिक्षक अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ थे। उनका ज्ञान और अनुभव बहुत समृद्ध था। लेकिन मेरी भाषा की कमजोरी मेरे और उनकी बातों के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी कर देती थी। दो-तीन महीने इसी संघर्ष में बीत गए। फीस जमा की जा चुकी थी। परिवार की अपेक्षाएँ सामने थीं। मन बार-बार कहता था—शायद वापस लौट जाना ही ठीक होगा। कई बार लगा कि यह कोर्स मेरे लिए नहीं है। और तभी मेरी मुलाकात हुई उस व्यक्ति से, जिसने मेरे पूरे सोचने का तरीका बदल दिया।
एक शिक्षक, जिसने मुझे पढ़ाने से पहले समझा
सहपाठियों की सलाह पर मैंने कोर्स कोऑर्डिनेटर अलकनंदा मैम से मिलने का निर्णय लिया। मैंने अपनी पूरी समस्या उनके सामने रख दी। उन्होंने मुझे बीच में रोका नहीं। उन्होंने यह नहीं कहा कि “तुम्हारी अंग्रेजी कमजोर है”, न ही यह कहा कि “इतने बड़े संस्थान में पढ़ना है तो अंग्रेजी तो आनी ही चाहिए।” उन्होंने पहले मुझे समझा। उन्होंने मेरी स्थिति को मेरी कमजोरी के रूप में नहीं, मेरी आवश्यकता के रूप में देखा। उन्होंने मुझे हिंदी में नोट्स और अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई। समझाया कि कठिनाई से भागना समाधान नहीं है। उन्होंने मेरे भीतर यह विश्वास पैदा किया कि यदि मैं मेहनत करूँ, तो इस कठिनाई को पार कर सकता हूँ। उनके कुछ शब्द शायद आज मुझे हूबहू याद नहीं हैं, लेकिन उनका विश्वास आज भी याद है। और कभी-कभी किसी शिक्षक के शब्दों से अधिक उसका विश्वास विद्यार्थी के भीतर काम करता है।
मैंने वापस लौटने का विचार छोड़ दिया। फिर मैंने पूरी ताकत लगा दी। दिन-रात पढ़ाई की। जो समझ नहीं आता, उसे बार-बार पढ़ा। जो नहीं आता था, उसे सीखने की कोशिश की। धीरे-धीरे अंग्रेजी का डर कम होने लगा। विषय समझ में आने लगे। आत्मविश्वास लौटने लगा। और देखते ही देखते वही विद्यार्थी, जो कुछ महीने पहले वापस लौटने के बारे में सोच रहा था, कक्षा के महत्वपूर्ण विद्यार्थियों में शामिल हो गया।
मेरे उस अनुभव ने मुझे जीवन का एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ाया—
किसी विद्यार्थी को बदलने से पहले उसे समझना जरूरी है। यदि समय रहते विद्यार्थी की समस्या को समझ लिया जाए, उसकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि को जाना जाए और उसकी क्षमता के अनुरूप शिक्षण की व्यवस्था की जाए, तो शायद बहुत से विद्यार्थी बीच रास्ते में पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर न हों। एक शिक्षक का पहला धर्म केवल पढ़ाना नहीं, समझना भी है।
वे शिक्षक, जिन्होंने हमें सिर्फ पढ़ाया नहीं
उस समय संस्थान में कई ऐसे शिक्षक थे, जिनका ज्ञान और अनुभव आज भी स्मृतियों में सुरक्षित है। तत्कालीन प्रभारी श्री थॉमस सर, ऑक्यूपेशनल थेरेपी के अमिताभ सर, फिजियोथेरेपी की वाजपेयी मैम, स्पीच थेरेपी की शेरॉन मैम, IEP की त्रिपर्णा मैम और न्यूरो विभाग के डॉ. अनिर्बान बसु—सभी अपने-अपने क्षेत्र में विशेषज्ञ थे। सबने अपने स्तर पर हमें बहुत कुछ दिया। लेकिन यदि कोई पूछे कि उन दिनों किसने मुझे सबसे अधिक समझा, तो मेरे मन में सबसे पहले अलकनंदा मैम और सौमी मैम का नाम आता है।
अलकनंदा मैम को मैं कभी भूल नहीं सकता। क्योंकि उन्होंने मुझे केवल पढ़ाई में सहायता नहीं दी थी; उन्होंने उस समय मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया था, जब मुझे स्वयं पर भरोसा नहीं रह गया था। आज जब मैं स्वयं विद्यार्थियों के बीच काम करता हूँ, तब उनकी भूमिका को और बेहतर समझ पाता हूँ।
वह पढ़ाई पूरी हुई या नहीं—यह सबसे महत्वपूर्ण बात नहीं है बाद में उस B.Ed. कोर्स के साथ क्या हुआ, वह मेरे लिए आज सबसे महत्वपूर्ण बात नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि मैंने वहाँ क्या पाया।
मैंने वहाँ संघर्ष करना सीखा। मैंने वहाँ स्वयं पर विश्वास करना सीखा। मैंने वहाँ शिक्षक की भूमिका को एक अलग दृष्टि से देखा। और सबसे बढ़कर, मैंने यह सीखा कि किसी कमजोर विद्यार्थी को कमजोर समझ लेना सबसे बड़ी भूल हो सकती है। एनआईएमएच में बिताया वह समय मेरे जीवन की अद्भुत और अविस्मरणीय स्मृतियों में से एक है।
वे मित्र, जो समय के साथ दूर हो गए, स्मृतियों से नहीं
उस समय की कक्षा में हम कई लोग थे—चंचल, सुरेश, विलाश, सुरजीत, रतन, शिवांशु, दीपंकर, श्यामल, अफसर आलम, विजय, कृष्णकांत, कन्हाई, इशिता, पियाली, पामेला, श्वेता, रूपा, मीता, गौरी, सिस्टर मैरी कुट्टी एंटनी और मानसी, और भी कई साथी। उस समय कहाँ पता था कि ये चेहरे कभी मेरी स्मृतियों का इतना बड़ा हिस्सा बन जाएंगे। कक्षा की बातें, साथ बैठना, पढ़ाई को लेकर चर्चाएँ, हँसी-मजाक, छोटी-छोटी परेशानियाँ और उन्हें मिलकर पार करने की कोशिश—आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि वही साधारण-से दिन कितने असाधारण थे। समय के साथ सब अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गए। किसी से संपर्क बना रहा, किसी से टूट गया। लेकिन दूरी हमेशा रिश्तों को खत्म नहीं करती। कुछ लोग जीवन से दूर हो जाते हैं, मगर स्मृतियों में वैसे ही बने रहते हैं।
मानसी—एक आत्मीय स्मृति
इन सभी सहपाठियों के बीच मानसी की स्मृति मेरे मन में कुछ अधिक आत्मीय है। उस समय शायद हममें से किसी ने यह नहीं सोचा था कि वर्षों बाद पीछे मुड़कर देखने पर किसी सहपाठी की साधारण-सी उपस्थिति भी इतनी खास लग सकती है। मानसी के साथ मेरे उस आत्मीय संबंध को किसी नाम या परिभाषा की आवश्यकता नहीं थी। वह बस एक सादा, सहज और आत्मीय लगाव था—जो उन दिनों की स्मृतियों के साथ चुपचाप जुड़ गया। कभी-कभी जीवन में कुछ लोग बहुत बड़ी भूमिका निभाए बिना भी हमारे भीतर एक विशेष स्थान बना लेते हैं। उनके साथ बिताए छोटे-छोटे क्षण, उनकी बातें, उनका सहज व्यवहार—सब कुछ समय बीतने के बाद भी मन में कहीं सुरक्षित रह जाता है।
मानसी भी मेरे लिए ऐसी ही एक स्मृति है। न कोई शिकायत, न कोई प्रश्न, न कोई अपेक्षा। बस एक पुरानी, कोमल और आत्मीय याद। आज इतने वर्षों बाद भी जब उन दिनों को याद करता हूँ, तो उस समय की पूरी दुनिया के साथ मानसी की वह सहज उपस्थिति भी स्मृतियों में लौट आती है। शायद कुछ रिश्तों की खूबसूरती इसी में होती है कि उन्हें किसी निष्कर्ष की आवश्यकता नहीं होती। वे बस याद बनकर अच्छे लगते हैं।
कई वर्षों बाद एक दिन अपने पुराने सहपाठी शिवांशु से फोन पर बात हुई और देखते ही देखते पुरानी स्मृतियों के बंद दरवाजे फिर खुलने लगे। बातों-बातों में पुराने दिनों की चर्चा शुरू हुई। कौन कहाँ है? किसका क्या हुआ? कौन किस संपर्क में है?
और फिर पता चला कि अलकनंदा मैम अब एनआईएमएच छोड़ चुकी हैं।
यह सुनकर मन कुछ देर के लिए जैसे उसी पुराने परिसर में पहुँच गया। कितना अजीब है न— कभी जिन लोगों के साथ रोज मिलना होता था, उनसे वर्षों तक कोई संपर्क नहीं रहता। फिर अचानक एक फोन आता है और स्मृतियों का बंद पड़ा कोई दरवाजा खुल जाता है। उस दिन बहुत-सी पुरानी बातें फिर याद आईं। फिर जीवन ने मुझे उसी दुनिया में वापस ला खड़ा किया। आज जीवन मुझे एक अलग दिशा में ले आया है।
मैं पिछले लगभग सोलह वर्षों से सरकारी सेवा में हूँ और वर्तमान में राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान में मुख्य प्रशिक्षक के रूप में अपनी सेवा दे रहा हूँ। लगभग दो महीने पहले मेरा स्थानांतरण उसी संस्थान में हुआ, जहाँ से मैंने कभी पढ़ाई की थी। यह मेरे लिए केवल एक स्थानांतरण नहीं था। यह मेरे अतीत और वर्तमान के बीच जैसे एक पुल बन गया।
एक समय मैं स्वयं विद्यार्थी था—अपनी कठिनाइयों से जूझता हुआ, अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित। आज मैं विद्यार्थियों के बीच खड़ा हूँ—उनकी समस्याएँ सुनने, उन्हें दिशा देने और उनके प्रशिक्षण में अपना योगदान देने की जिम्मेदारी के साथ। मैं अपने नए पदस्थापन संस्थान में पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ अपना उत्कृष्ट योगदान देना चाहता हूँ। हर कार्यस्थल की अपनी कुछ जटिलताएँ होती हैं। कहीं कार्यालयी राजनीति होती है, कहीं व्यक्तिगत समीकरण, कहीं अनावश्यक दिखावे और कहीं जिम्मेदारियों से बचने की प्रवृत्ति।
इन सबको देखकर कभी-कभी मन विचलित होता है। लेकिन मुझे फिर एनआईएमएच का वह विद्यार्थी याद आता है। वही विद्यार्थी, जो अंग्रेजी से डर गया था। वही विद्यार्थी, जिसने एक समय हार मानने का मन बना लिया था। और वही विद्यार्थी, जिसे एक शिक्षक ने सिर्फ इतना एहसास कराया था कि— “तुम कर सकते हो।” तब लगता है कि हर परिस्थिति का उत्तर परिस्थितियों से लड़ना नहीं होता। कुछ लड़ाइयाँ छोड़ देनी चाहिए और अपने कर्म को बोलने देना चाहिए।
हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं, हर व्यवहार का प्रतिकार करना जरूरी नहीं, हर लड़ाई लड़ना भी जरूरी नहीं। जरूरी है कि हम अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाते रहें। क्योंकि अंततः पद से अधिक महत्वपूर्ण हमारा काम होता है और पहचान से अधिक महत्वपूर्ण हमारे द्वारा किसी के जीवन में छोड़ा गया प्रभाव।
शायद यही कारण है कि आज भी जब कोई विद्यार्थी किसी कठिनाई में दिखाई देता है, तो मैं उसके भीतर उस विद्यार्थी को खोजने लगता हूँ, जो कभी स्वयं मेरे भीतर था। और तब अलकनंदा मैम की याद आती है।
कुछ जगहें हमें छोड़ देती हैं, लेकिन हम उन्हें नहीं छोड़ पाते। कभी-कभी सोचता हूँ कि मेरे जीवन की पहली और आखिरी हॉस्टल-आधारित विद्यार्थी जीवन की स्मृति भी कोलकाता से ही क्यों जुड़ी रही। बोन हॉगली, अनन्या, बरानगर, डनलप, बैरकपुर और वह पुराना एनआईएमएच— आज ये सब मेरे वर्तमान जीवन का हिस्सा नहीं हैं। लेकिन मेरी स्मृतियों का हिस्सा आज भी हैं।
अब जीवन बहुत आगे निकल आया है। जिम्मेदारियाँ बदल गई हैं। पद बदल गया है। लोग बदल गए हैं। शहर बदल गए हैं। लेकिन भीतर कहीं एक विद्यार्थी अब भी वैसा ही है। वह आज भी उस परिसर की गलियों में चलता है, पुराने साथियों को खोजता है, किसी परिचित आवाज़ को सुनने की कोशिश करता है और शायद कभी-कभी मन ही मन उन दिनों को फिर से जी लेता है।
अंत में…समय बहुत कुछ बदल देता है। जगहें बदल जाती हैं। लोग दूर हो जाते हैं। रास्ते अलग हो जाते हैं। और जीवन हमें ऐसी दिशाओं में ले जाता है, जिनकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती। लेकिन कुछ स्मृतियाँ समय के साथ धुंधली नहीं होतीं। वे हमारे भीतर कहीं चुपचाप जीवित रहती हैं—किसी पुराने परिसर की तरह, किसी शिक्षक की आवाज़ की तरह, किसी मित्र की मुस्कान की तरह और किसी ऐसे आत्मीय व्यक्ति की याद की तरह, जिसका नाम लेते ही बीते हुए दिनों की पूरी दुनिया आँखों के सामने उतर आती है।
एनआईएमएच मेरे लिए केवल एक संस्थान नहीं था। वह मेरे जीवन का वह अध्याय था, जहाँ मैंने कठिनाइयों से जूझना सीखा, स्वयं पर विश्वास करना सीखा और सबसे बढ़कर यह सीखा कि—
किसी विद्यार्थी को बदलने से पहले उसे समझना जरूरी है। आज जब मैं स्वयं विद्यार्थियों के बीच काम करता हूँ, तो कहीं न कहीं मेरे भीतर वह विद्यार्थी अब भी जीवित है। वही विद्यार्थी, जिसे कभी लगा था कि शायद वह यह रास्ता पूरा नहीं कर पाएगा। और शायद इसी वजह से आज मैं किसी विद्यार्थी की कमजोरी देखने से पहले उसकी परिस्थिति को समझने की कोशिश करता हूँ। क्योंकि मुझे मालूम है—कभी-कभी एक शिक्षक का थोड़ा-सा विश्वास किसी विद्यार्थी के पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है। और फिर, जब कभी अतीत की खिड़की खुलती है, तो कोलकाता की वे गलियाँ, पुराने साथी, अलकनंदा मैम, सौमी मैम, मानसी और एनआईएमएच की वे स्मृतियाँ एक साथ सामने आ खड़ी होती हैं।
तब अनुभव होता है— कुछ लोग जीवन से चले जाते हैं, लेकिन स्मृतियों से कभी नहीं जाते। कुछ रिश्तों को कोई नाम नहीं मिलता, फिर भी वे मन के सबसे कोमल कोने में हमेशा बने रहते हैं। और कुछ जगहें पीछे छूट जाती हैं, लेकिन उनसे जुड़ा हुआ हमारा एक हिस्सा वहीं ठहर जाता है। एनआईएमएच का वह दौर मेरे लिए कोई अधूरा अध्याय नहीं है। वह मेरे जीवन की उन अनमोल स्मृतियों में से एक है, जिन्हें समय मिटा नहीं सकता।
आज भी जब उन दिनों को याद करता हूँ, तो लगता है—जीवन कितना भी आगे निकल जाए, भीतर का वह विद्यार्थी कहीं न कहीं वहीं खड़ा रहता है… उन पुराने दिनों की ओर देखता हुआ, और चुपचाप मुस्कुरा देता है।
— चन्द्र मणि पाण्डेय
