दुनिया का रंग
तलाश का आगाज़
एक छोटा सा लड़का था—आरव। उसकी आँखों में दुनिया को देखने की एक अजीब सी बेताबी थी। एक शाम, जब आसमान में सूरज डूब रहा था और लाल-नारंगी किरणें पेड़ों की ओट से झांक रही थीं, उसने अपनी माँ का पल्ला पकड़ा और पूछा, “माँ, दुनिया का रंग कैसा है?” माँ ने मुस्कुराकर आरव के माथे को चूमा और कहा, “बेटा, यह दुनिया वैसी ही है, जैसा रंग तुम इसमें देखना चाहो। जाओ, खुद ढूंढ कर आओ।”
आरव अपनी छोटी सी डायरी लेकर घर से निकल पड़ा।
पहला पड़ाव: दौलत का सुनहरा रंग
आरव सबसे पहले शहर के सबसे अमीर आदमी के आलीशान बंगले के सामने पहुंचा। वहाँ सोने-चांदी की चमक थी, कीमती गाड़ियाँ थीं। आरव ने उस अमीर आदमी से पूछा, “बाबूजी, दुनिया का रंग कैसा है?”
उस आदमी ने एक ठंडी सांस ली, अपनी सोने की घड़ी को देखा और बुझे हुए दिल से कहा:
“बेटा, दुनिया का रंग ‘सुनहरा’ है। लेकिन यह सोना सिर्फ आँखों को चौंधियाता है, दिल को तसल्ली नहीं देता। इस चमक के पीछे बड़ा अंधेरा है, यहाँ कोई किसी का नहीं है।”
आरव ने अपनी डायरी में लिख लिया—दुनिया सुनहरी है, पर बहुत ठंडी है।
दूसरा पड़ाव: संघर्ष का मटमैला रंग
आगे बढ़ते हुए, आरव एक चौराहे पर रुका जहाँ एक बूढ़ा मजदूर पसीने से लथपथ, भारी बोरे उठा रहा था। उसकी फटी हुई बिवाइयों से खून रिस रहा था, लेकिन आँखों में अपने परिवार को पालने की ज़िद थी। आरव ने उसके पास जाकर वही सवाल दोहराया।
मजदूर ने अपने गंदे अंगौछे से माथे का पसीना पोंछा और बोला:
“बाबू, दुनिया का रंग ‘मटमैला’ (धूल जैसा) है। रोज़ कुआं खोदना और रोज़ पानी पीना। यहाँ सिर्फ पसीना और मिट्टी ही सच है।”
आरव की आँखें भर आईं। उसने डायरी में लिखा—दुनिया का रंग मिट्टी जैसा है, जिसमें ज़िम्मेदारी की महक है।
तीसरा पड़ाव: मासूमियत का सफेद रंग
शाम ढलने को थी। आरव एक अनाथ आश्रम के पास से गुजरा। वहाँ कुछ बच्चे फटे-पुराने कपड़ों में एक टूटी हुई गेंद से खेल रहे थे। उनके पास न खिलौने थे, न अच्छे कपड़े, लेकिन उनकी खिलखिलाहट से पूरा मैदान गूंज रहा था।
आरव ने एक बच्चे का हाथ पकड़कर पूछा, “तुम्हें यह दुनिया कैसी लगती है? इसका रंग क्या है?”
बच्चे ने अपनी बड़ी-बड़ी मासूम आँखों से आरव को देखा और ताली बजाकर हँसते हुए बोला:
“दुनिया तो बिल्कुल ‘सफेद’ है भैया! जैसे कोरा कागज़। हम रोज़ इस पर अपनी हंसी से नए रंग भरते हैं।”
आरव का दिल भर आया। उसने लिखा—दुनिया सफेद है, जो हर गम को भुलाकर मुस्कुराना जानती है।
कलम का आखिरी पन्ना: माँ की गोद
रात हो चुकी थी। आरव थका-हारा, उदास और उलझा हुआ अपने घर लौटा। उसने अपनी डायरी माँ के सामने रख दी, जिसमें सुनहरा, मटमैला और सफेद रंग बिखरे हुए थे।
उसने रोते हुए कहा, “माँ, मैं हार गया। हर किसी के लिए दुनिया का रंग अलग है। मुझे तो समझ ही नहीं आया कि असल में दुनिया का रंग है कैसा?”
माँ ने आरव को अपनी छाती से लगा लिया। माँ का आंचल ममता की खुशबू से महक रहा था। माँ ने उसकी आँखों के आंसू पोंछे और बेहद भावुक आवाज़ में कहा:
“मेरे बच्चे… दुनिया का अपना कोई रंग नहीं होता। जब तुम किसी के बहते हुए आंसू पोंछते हो, तो यह ‘दया’ के रंग में रंग जाती है। जब तुम किसी भूखे को रोटी देते हो, तो यह ‘तृप्ति’ के रंग में बदल जाती है। और जब तुम किसी को बेइंतहा प्यार करते हो, तो यह दुनिया ‘मोहब्बत’ के सबसे खूबसूरत रंग में सराबोर हो जाती है।दुनिया का असली रंग वही है, जो तुम्हारी रूह का रंग है।”
आरव को अपनी तलाश का जवाब मिल चुका था। उसने माँ की गोद में सिर रख दिया, और उस रात उसकी डायरी का हर पन्ना सतरंगी हो गया था।
धर्मेंद्र शर्मा की कलम से निकली यह दास्तान हमें सिखाती है कि दुनिया को बाहर ढूंढने से बेहतर है, हम अपने भीतर के इंसान को जिंदा रखें। दुनिया वैसी ही दिखेगी, जैसे हम खुद होंगे।
— धर्मेंद्र शर्मा
