कविता

खुद में समाकर तो देखिए

खुद समाएं किसी समंदर में हम बूंद बनकर,
बूंद ही समंदर का अंश हो समंदर बन जाएगी,
विशाल समंदर का अनमोल हिस्सा होंगे हम,
जिंदगी विशाल होकर विशालता में मुस्काएगी।

नदी उमंग से बहती हुई समंदर की ओर भागती है,
वह सोती नहीं पल भर भी, हरदम रहती जागती है,
नदी की तरह समंदर में एक बार समाकर तो देखो,
देखोगे कि दुनिया तुमसे जीने की दुआ मांगती है!

क्षुद्र बूंद से विशाल हो जाना अपने आप में एक कला है,
इसी कला में पारंगत हो जाने में ही हमारा भला है,
जरूरी है कला जीवन के लिए और जीवन कला के लिए,
प्रभु की दी हुई सुंदरता से यह जीवन पला है और ढला है।

पल भर के लिए ही सही खुद में समाकर तो देखिए,
खुद से कभी मुलाकात कर #मंथन करके तो देखिए,

जीवन महकेगा, जीने का असली आनंद आ जाएगा,
बूंद बनकर किसी समंदर में समाकर तो देखिए!

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

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