खुद में समाकर तो देखिए
खुद समाएं किसी समंदर में हम बूंद बनकर,
बूंद ही समंदर का अंश हो समंदर बन जाएगी,
विशाल समंदर का अनमोल हिस्सा होंगे हम,
जिंदगी विशाल होकर विशालता में मुस्काएगी।
नदी उमंग से बहती हुई समंदर की ओर भागती है,
वह सोती नहीं पल भर भी, हरदम रहती जागती है,
नदी की तरह समंदर में एक बार समाकर तो देखो,
देखोगे कि दुनिया तुमसे जीने की दुआ मांगती है!
क्षुद्र बूंद से विशाल हो जाना अपने आप में एक कला है,
इसी कला में पारंगत हो जाने में ही हमारा भला है,
जरूरी है कला जीवन के लिए और जीवन कला के लिए,
प्रभु की दी हुई सुंदरता से यह जीवन पला है और ढला है।
पल भर के लिए ही सही खुद में समाकर तो देखिए,
खुद से कभी मुलाकात कर #मंथन करके तो देखिए,
जीवन महकेगा, जीने का असली आनंद आ जाएगा,
बूंद बनकर किसी समंदर में समाकर तो देखिए!
— लीला तिवानी
