खतरनाक खेल
खतरनाक खेल खेला जा रहा है
मानव मानों कठपुतली हो गये हैं,
औरत का रुतबा बाहर से भव्य है,
किंतु मादा से ज्यादा हैसियत नहीं,
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में त्वचा
प्रतिपल संवेदना शून्य हो रही है,
युद्ध में हो रहे सर्वनाश के बारे में
किसीको कोई परवाह ही नहीं है,
प्राकृतिक आपदाओं के बारे में भी
संज्ञान लेने का वक्त किसके पास है?
अब जिंदगी को यंत्र सी कैसे कहेंगे?
यंत्र तो बिगड़कर बंद पड जाता हैन!
आधुनिक युग की संकुचित सोच
समग्र सृष्टि को कहां ढकेल रही है?
— पुष्करराय जोषी
