बूँद मिली जब सिंधु में
बूँद मिली जब सिंधु में, मिटा बूँद का भान।
मैं-तू का पर्दा गिरा, एक हुआ अरमान।
नदिया बनकर चल पड़ी, मन में लेकर आस।
राहों में पत्थर मिले, छोड़ी ना फिर प्यास।
सागर की ही ओर था, हर पल मेरा ध्यान।
बूँद मिली जब सिंधु में, मिटा बूँद का भान॥
मैंने खुद को ढूँढकर, पाया तेरा रूप।
धूप बनी तेरी हँसी, छाँव बना हर रूप।
तू ही मेरी साँस है, तू ही मेरी जान।
बूँद मिली जब सिंधु में, मिटा बूँद का भान॥
मैं थी अपना नाम ले, तू भी अपने नाम।
किया प्रेम ने अब हमें, एक धड़कता धाम।
न मैं रहा, ना तू रहा, मिटा अलग पहचान।
बूँद मिली जब सिंधु में, मिटा बूँद का भान॥
ना कोई दूरी रह गई, ना कोई व्यवधान।
रूह मिली जब रूह से, खिल उठा अरमान।
मैं-तू का पर्दा गिरा, एक हुआ जब गान।
बूँद मिली जब सिंधु में, मिटा बूँद का भान॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
