हास्य व्यंग्य

व्यंग्य : पानी की बोतल और लोकतंत्र की प्यास

देश में चुनाव हो रहे हों और चर्चा पानी की बोतल पर न हो-ऐसा कैसे हो सकता है! आखिर लोकतंत्र को भी बीच-बीच में पानी चाहिए और चुनाव आयोग को भी।

अब सवाल उठ रहा है कि चुनाव आयोग के सामने रखी पानी की बोतल पाँच रूपये की हो या पाँच सौ की? इस पर देश की जनता इतनी गंभीर हो गई है, मानो अगला चुनाव बोतल के ढक्कन के रंग से तय होना हो!

भाई, चुनाव आयोग चुनाव कराता है, पानी की सप्लाई नहीं। अगर किसी शहर में नल सूखा पड़ा है, मोहल्ले में टैंकर का इंतजार हो रहा है और जनता बाल्टी लेकर लाइन में खड़ी है, तो उसका हिसाब-किताब उस विभाग से होना चाहिए जिसके जिम्मे पानी पहुँचाना है। चुनाव आयोग से यह पूछना कि आपने अपनी बैठक में कौन-सा पानी पिया, कुछ वैसा ही है जैसे डाकिए से पूछना-“भाई, हमारे इलाके में सड़क कब बनेगी?”

चुनाव आयोग चाहे तो मिट्टी के घड़े का पानी पीए, चाहे सरकारी बोतल का, चाहे बाजार से खरीदा मिनरल वाटर। हाँ, यह सवाल जरूर वाजिब लगता है कि भाई इतना महंगा पानी क्यों पी रहे हो। इतने में तो हम एक टैंकर पानी डलवा ले और पूरा परिवार चार दिन तक नहाता रहे। और तो और कपड़े भी धो ले!

यह अलग बात है कि लोकतंत्र की मशीनरी चलाने के लिए पानी भी चाहिए वह भी शुद्ध। आखिर अधिकारियों और कर्मचारियों को भी तो प्यास लगती है-यह कोई संवैधानिक अपराध तो नहीं! क्योंकि “प्यास हैं बड़ी…”

हाँ, जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि सरकारी पैसे से क्या खरीदा गया, कितने में खरीदा गया और नियमों के अनुसार खरीदा गया या नहीं। पारदर्शिता तो लोकतंत्र का पानी है-यह साफ रहना ही चाहिए।

बाकी बोतल देखकर तूफान खड़ा करना भी कमाल है! कल को कोई पूछ बैठेगा-“चुनाव आयोग ने पानी ठंडा क्यों पिया?”

फिर जवाब आएगा-“भाई साहब, चुनाव अधिकारी गरम थे… पानी तो ठंडा रखना ही पड़ेगा!” क्योंकि ऊपर से विपक्षी पार्टियों के रोज़मर्रा उलाहने भी तो सुनना पड़ते हैं? और जनता सोचती रह जाएगी-देश में पानी की समस्या बड़ी है या पानी की बोतल की कीमत? 

हमारा भैया भी बोलता है कि पीने दो नी यार कौन सा डायरेक्ट अपन के जेब से बोतल का पईसा जई रिया है। आखिर बड़ा लोग हैं, बड़ा लोग तो बड़ो काम ही करें। मैं तो ये कहूँ की जो खाली बोतल का कैरेट पड़ा रे, वो हमके दई दो उका मा पाणी भर लांगा और शान से सगळ्या के बोलाँगा कि देखों हूँ भी पाँच सौ वाला बोतल में पी सकूँ हूँ!

— संजय एम तराणेकर

संजय एम. तराणेकर

जन्म वर्ष 1968 कवि, स्वतंत्र लेखक व टिप्पणीकार। शिक्षा स्नातक एवं गायन में 1986 में विद् किया होकर केन्द्रीय सचिवालय हिन्दी परिषद् द्वारा हिन्दी आषुलिपि प्रतियोगिता में वर्ष 1992 प्रषस्ति-पत्र प्राप्त। विशेष रूचि-बॉलीवुड फिल्में एवं संगीत, पुस्तक समीक्षा एवं राजनीति। मैं मूलतः मध्य प्रदेश के स्वच्छता में हैट्रिक लगा चुके एवं चार बार नंबर वन बनें स्मार्ट सिटी इन्दौर का निवासी हूँ। 1990 के दशक में लेखन में मन रमने लगा और ‘पत्र संपादक के नाम‘ से अपनी प्रारंभिक शुरूआत की। लेखकीय सुकून कितना संतोष देता है, इसकी बात ही कुछ और है। युवा होने पर फिल्मी कलाकारों की तरफ झुकाव ने फिल्मों पर आलेख लिखने की प्रेरणा दी। इसमें मेरी रूचि भी थी। विशेषकर पुराने फिल्मी कलाकारों के जीवन से सम्बंधित आलेखों पर अधिक ध्यान आकर्षित रहा। बावजूद इसके लघु कथा व कविता (बतौर युवा कवि आकाशवाणी इन्दौर में कविता पाठ के भी कई अवसर प्राप्त हुए है।) के अलावा सामयिक, सामाजिक एवं राजनैतिक विषयों पर समय-समय पर अपनी लेखनी को आयाम देने के प्रयास आज भी अनवरत हैं। अब तक विभिन्न समाचार-पत्रों में मुख्य रूप से बॉलीवुड/सिनेमा की साप्ताहिक मेगजीनों में आलेखों एवं पुस्तक समीक्षाओं का प्रकाशन हो चुका है। इनमें ‘लोकमत समाचार-आकर्षण व शो टाईम, राजस्थान पत्रिका-बॉलीवुड, पंजाब केसरी व दैनिक ट्रिब्यून के मनोरंजन, राज एक्सप्रेस-राज सिनेमा, द सी एक्सप्रेस-सी सिनेमा, हरि-भूमि के रंगारंग व रविवार भारती, चौथा संसार के बॉलीवुड, बीपीएन टाईम्स के शो बीपीएन व तरंग, लोकदशा के पर्दा-बेपर्दा व विविधा, नव-भारत एवं स्वतंत्र भारत के अलावा कई स्थानीय समाचार-पत्रों में भी आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। वहीं ‘स्वतंत्र वार्ता एवं डेली हिन्दी मिलाप‘ में कई वर्षो तक नियमित रूप से लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 31, संजय नगर, इन्दौर-452011 मध्य प्रदेश, (वार्ता+वाट्स एप) 98260.25986 ईमेलः s.taranekar@rediffmail.com, Facebook – https://www.facebook.com/Taranekar9

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