अगर UPI से है प्यार तो MDR से कैसे करें इनकार!
पहले आदत लगाइए, फिर कीमत चुकाइए। यह फार्मूला सदियों से चला आ रहा है। ड्रग माफिया भी कुछ ऐसा ही करते हैं। पहले अनजाने में आदत लगवाते हैं और जब इंसान उसका आदी हो जाता है तो फिर मनमानी कीमत वसूलते हैं। फर्क इतना है कि ऐसा करने वाले की निंदा होती है, उसे अपराधी कहा जाता है। नामी टेलीकॉम कंपनी जब कभी मुफ्त या बेहद सस्ता इंटरनेट देकर लोगों को उसकी आदत लगाई थेी और बाद में कीमत वसूलनी शुरू की, तो बात समझ में आती है। आखिर कंपनी का उद्देश्य ही मुनाफा कमाना है।
लेकिन जब यही तर्क सरकार की व्यवस्था में दिखाई देने लगे तो बात कुछ गले नहीं उतरती। क्योंकि सरकार कोई मुनाफाखोर कंपनी नहीं होती। सरकार तो देश चलाने के लिए होती है।एक जमाना था जब जेब में पैसे न हों तो दुकानदार से कहते थे—“भैया, कल दे देंगे।”फिर आया मोबाइल।उसके बाद आया UPI। सरकार और बैंकिंग व्यवस्था ने हमें खूब समझाया—न नकदी रखिए, न छुट्टे की चिंता कीजिए। बस मोबाइल निकालिए, QR कोड स्कैन कीजिए और पैसा पहुंच गया। “लेन-देन में नकदी का क्यों लें जोखिम? UPI है न!” बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी फिल्म का हीरो हीरोइन से कहता है— “किसका है ये तुमको इंतज़ार, मैं हूँ ना… देख लो इधर भी एक बार, मैं हूँ ना।
हीरो पर भरोसा हुआ, फिर क्या था! देखते ही देखते बात— “आए हो मेरी जिंदगी में तुम बहार बन के…” तक पहुंच गई। UPI भी हमारी जिंदगी में कुछ इसी अंदाज में दाखिल हुआ। चाय वाले से लेकर सब्जी वाले तक के हाथ में QR कोड आ गया। दस रुपये की चाय हो या दस हजार का सामान—“UPI कर दीजिए” हमारी रोजमर्रा की भाषा का हिस्सा बन गया। जिस सब्जी वाले के पास कभी छुट्टे पैसे नहीं होते थे, उसने भी QR कोड लगा लिया। जिस ग्राहक को बैंक की लाइन में खड़े होने से परेशानी होती थी, वह मोबाइल पर दो सेकंड में भुगतान करने लगा। जिस देश में कभी लोग नकदी को सबसे सुरक्षित मानते थे, उसी देश में अब कई लोगों को नकदी रखना ही झंझट लगने लगा है। आदत पड़ गई।
और जब आदत पड़ गई तो अब खबर आई है कि ₹2,000 से ऊपर के कुछ व्यापारी UPI लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होगा। ₹75,000 या उससे अधिक के लेन-देन पर इसकी अधिकतम सीमा ₹300 प्रति लेन-देन रखी गई है। यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है। यह ग्राहक पर लगाया गया UPI टैक्स नहीं है। व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले UPI भुगतान मुफ्त रहेंगे। ₹2,000 तक के व्यापारी भुगतान भी मुफ्त रहेंगे और सरकार के अनुसार छोटे व्यापारियों के लिए भी जीरो-MDR की व्यवस्था जारी रहेगी। सरकार का कहना है कि करीब 96 प्रतिशत व्यापारी लेन-देन इस बदलाव से प्रभावित नहीं होंगे। तो फिर परेशानी क्या है? परेशानी सिर्फ शुल्क की नहीं है। परेशानी उस एहसास की है कि पहले हमें एक सुविधा की आदत डलवाई गई और अब उसी व्यवस्था की लागत का नया अध्याय शुरू हो रहा है।
सरकार कह रही है कि MDR ग्राहक से नहीं लिया जाएगा। दुकानदार पर ही रहेगा और उसे ग्राहक पर डालने की अनुमति भी नहीं होगी। लेकिन छोटा-बड़ा कोई भी व्यापारी आखिर लागत का हिसाब तो रखता ही है। आज वह अपनी जेब से दे, कल कीमत में थोड़ा समायोजन करे या किसी दूसरे तरीके से लागत संभाले—यह बाजार की अपनी कहानी है। सवाल यह है कि जब देश को डिजिटल बनाना था, तब हमें बार-बार कहा गया— नकद छोड़िए | डिजिटल बनिए। UPI अपनाइए। हमने कहा—ठीक है। हम डिजिटल बन गए। इतने डिजिटल कि अब जेब में दस रुपये न हों तो भी चिंता नहीं होती, लेकिन मोबाइल में UPI न चले तो बेचैनी होने लगती है। चाय वाला डिजिटल। सब्जी वाला डिजिटल। दूध वाला डिजिटल। रिक्शा वाला डिजिटल।मोहल्ले की किराने की दुकान डिजिटल। और ग्राहक? वह तो कब का डिजिटल हो चुका है। अब सवाल उठता है—
जब डिजिटल भुगतान को देश की आदत बनाने में सरकार की इतनी बड़ी भूमिका थी, तो उसकी भविष्य की लागत को लेकर इतनी चिंता आज क्यों दिखाई दे रही है?
सरकार का अपना तर्क है कि UPI के पूरे डिजिटल इकोसिस्टम को लंबे समय तक चलाने, उसकी सुरक्षा, तकनीकी ढांचे और विस्तार के लिए एक टिकाऊ व्यवस्था चाहिए। सरकार यह भी स्पष्ट कर चुकी है कि MDR सरकार या NPCI द्वारा वसूला जाने वाला टैक्स नहीं है, बल्कि भुगतान व्यवस्था से जुड़े बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडरों और ऐप प्रदाताओं के बीच बांटा जाएगा।तर्क अपनी जगह है। लेकिन जनता का सवाल भी अपनी जगह है।
जिस सुविधा को कल तक लगभग मुफ्त की तरह इस्तेमाल करने की आदत डाली गई, उसकी लागत का सवाल आज क्यों पैदा हुआ? यही वह जगह है जहां आम आदमी को कभी जियो का शुरुआती दौर याद आता है, कभी मुफ्त इंटरनेट के ऑफर याद आते हैं और कभी अंग्रेजों द्वारा चाय की आदत फैलाने वाली पुरानी कहानी। पहले चाय का चस्का। फिर चाय रोज की जरूरत।
और अब सुबह की चाय न मिले तो लगता है दिन ही शुरू नहीं हुआ!
हालांकि UPI और चाय की तुलना पूरी तरह समान नहीं है और UPI कोई नशा भी नहीं है। लेकिन व्यंग्य का सवाल तो पूछा ही जा सकता है— पहले आदत लगवाइए, फिर हिसाब समझाइए—यह तरीका आखिर इतना लोकप्रिय क्यों है? और सरकार से सवाल इसलिए ज्यादा तीखा हो जाता है क्योंकि सरकार से जनता का रिश्ता किसी दुकान या कंपनी जैसा नहीं होता।
सरकार से जनता सिर्फ सामान नहीं खरीदती। वह भरोसा खरीदती है। कर देती है। नियम मानती है। व्यवस्था पर विश्वास करती है। और बदले में उम्मीद करती है कि नीतियां बनाते समय उसका हित सबसे आगे रहेगा। इसलिए मुद्दा केवल 0.4 प्रतिशत MDR का नहीं है।
मुद्दा यह है कि कहीं डिजिटल सुविधा धीरे-धीरे ऐसी अनिवार्यता न बन जाए कि उसके बिना रोजमर्रा का जीवन मुश्किल लगे और फिर उसकी लागत को लेकर आम आदमी के पास बहुत कम विकल्प बचें। आज सरकार कह रही है—UPI ग्राहकों के लिए मुफ्त है।बहुत अच्छी बात है।तो फिर जनता भी यही चाहेगी कि यह “मुफ्त” शब्द सिर्फ आज की घोषणा न रहे, बल्कि लंबे समय तक भरोसे का शब्द बना रहे। क्योंकि जनता को डिजिटल बनाना आसान नहीं था। चाय वाले से लेकर सब्जी वाले तक को QR कोड समझाना पड़ा। बुजुर्गों को मोबाइल से भुगतान सिखाना पड़ा। लोगों ने नकदी से डिजिटल की तरफ कदम बढ़ाया। और अब जब पूरा देश डिजिटल भुगतान की धुन में रम गया है तो जनता का इतना पूछना तो बनता है—“भैया, जब हमें UPI की आदत लगाई जा रही थी, तब यह भी बता देते कि आगे चलकर हिसाब-किताब बदल सकता है!”
सरकारें बदलती हैं। योजनाएं बदलती हैं। नियम बदलते हैं। लेकिन जनता की याददाश्त इतनी भी कमजोर नहीं होती। उसे याद रहता है कि कभी कहा गया था—“कैश छोड़ो, डिजिटल बनो।” जनता डिजिटल बन गई। अब जनता सिर्फ इतना चाहती है— डिजिटल बनाइए, जरूर बनाइए लेकिन डिजिटल होने की कीमत भी पहले से साफ-साफ बताइए।
क्योंकि सवाल सिर्फ MDR का नहीं है। सवाल उस भरोसे का है, जिसकी वजह से चाय वाले से लेकर सब्जी वाले तक ने अपनी दुकान पर QR कोड लगाया था।और आखिर में जनता का सवाल वही— “अगर UPI से है इतना प्यार, तो MDR से कैसे करें इनकार?”
— प्रज्ञा पाण्डेय मनु
