डिफॉल्ट

दोहा छंद

पड़ा लिखा भी आज कल, धक्के खाता रोज।
मिलती नहीं है नौकरी, करे कहाँ तक खोज।।

जाने  कैसे  है  बढ़ा,   उनका  धन  भंडार।
और वही हैं कह रहे, झूठों  की  सरकार।।

राजनीति में तंत्र का, अपना अलग प्रभाव।
कोई  भरता  जेब  है,    कोई  देता  घाव।।

शासन सत्ता तंत्र जब, होता है मजबूत।
तभी देश आगे बढ़े, कोई नहीं अछूत।।

कुर्सी खातिर हो रहा, आज नया नित खेल।।
तंत्र -मंत्र  की  आड़  में,   बेच  रहे  हैं  तेल।।

कौन  यहाँ  गद्दार  है,    बड़ा  प्रश्न  है  आज।
समझ नहीं है आ रहा, क्या है उसका राज।।

आया अवसर हाथ में, नहीं  छोड़ना  मित्र।
वरना होगा आपका, जीवन बड़ा विचित्र।।

अवसर उसे तलाशती, जिसको होती चाह।
जो  झूठा  नाटक  करे, उसे  नहीं दे  राह।।

ईश्वर जो निर्णय करे, आप करो स्वीकार।
वही  करेंगे  मानिए, हर  बाधा  से  पार।।

निर्णय सुन पित-मातु का, झुका लिया यदि शीश।
उनके  ही  आशीष  से,      कृपा  करें  जगदीश।।

लोग  ताक  में हैं  यहाँ, कैसे  खेले  खेल।
करे ईश से प्रार्थना, हम हों कभी न फेल।।

मर्यादा को ताक  पर, रखते हैं  अब लोग।
बस  करना  संतोष है, मान  इसे  दुर्योग।।

मर्यादा रख ताक पर, माँगा दो वरदान। 
कैकेई  परिणाम से, नहीं रही अंजान।। 

नीयत अपनी साफ रख, कष्ट  लीजिए झेल। 
सत्य राह काँटो भरी, अल्प समय का खेल।।

मीठी  बोली  से  सभी,      बन  जाते  हैं काम। 
इससे पावन सुख कहाँ,  मिले मुफ्त सुखधाम।  

गोली मीठी खा जरा, रहो मगन  मन आप। 
हृदय नाम निज ईश का, करते रहिए जाप।।

तंग सभी के साथ हैं, नहीं दाम है जेब।
यही  सबसे  बड़ा, है  प्राणी  का  ऐब।।

रिश्ते भी अब तंग है, नहीं मधुरता भाव।
सहने को मजबूर हैं, नित नूतन ही घाव।।

खाली  रहते  हैं  मगर,  मिले  कहाँ  आराम।
सोच रहा हूँ रात-दिन, करना क्या है काम।।

मिले कहाँ आराम अब, जीवन में जब द्वंद्व।
करते रहते हम सभी, नाहक ही  छलछंद।।

कलमकार  जितने  यहाँ, सभी बड़े  हैं  मस्त।
लिखते-पढ़ते कुछ नहीं, मगर सभी हैं पस्त।।

नहीं पाँव जंजीर है, फिर भी कैद शरीर।
मन के बंधन खोलिए, आप मिटेगी पीर।। 

सोने  की  जंजीर  भी, लगती  जैसे  भार। 
अगर नहीं मिलता हमें, जीने का आधार।।

शर के जैसा चुभ रही, मुझको तेरी बात।
समझ मुझे आया नहीं, ये तेरा प्रतिघात।।

द्वारे  आया  पर्व  है,     फैला  हर्ष  अपार। 
सजे-धजे घर कह रहे, कृपा करो दातार।।

उत्सव जीवन राग है, धड़कन में उल्लास।
प्रेम बना संगीत है, छाया जस मधुमास।।

बंधन   प्यारा  जोड़ने,      आता  है  त्यौहार।
रंग, गुलाल, मिठास भी, दस्तक दे हर द्वार।।

समारोह  है  लग  रहा,    सपनों  का  संसार।
बाँटो खुशियाँ सब मिले, जीवन का है सार ।।

धरा  महोत्सव  धमक से,  गूँज  रहा  है  गान।
संस्कृति के रंग-रुप से, दमके सकल जहान।।

कायरता से  व्यर्थ है, रखना  झूठी  आस।
टकराने  वाला ‌ सदा, रचता  है इतिहास।।

चाहे जितना कीजिए, आप सभी नित शोर।
नेताओं  के  कान  तो, सुनने  में  कमजोर।।

कहे नीति चाणक्य की, छल से कर परहेज। 
रिश्ते-नाते   सत्य   के, आप   बढ़ेगा   तेज।।

मेरा   अपना   हौसला,    है   मेरी   पहचान।
आप मुझे मत दीजिए, झूठ -मूठ का ज्ञान।।

लेकर  आता  है  क्षमा,     पर्यूषण  का  पर्व। 
बैर-भाव  तज  कीजिए, आप धर्म पर गर्व।। 

मान क्रोध  माया तजो,  और लोभ  का संग। 
जीवन  में  होगा  सदा, खुशियों का नवरंग।।

सतगुरु की  केवल कृपा, एकमात्र  आधार।
कर सकते हैं बस वही,  भवसागर से पार।।

राजनीति  में जो  गधे,   रेंक  रहे हैं  खूब।
नहीं ज्ञान का बोध है, व्यर्थ सड़े तरबूज।।

आज गधों के शीश पर, अर्थ व्यवस्था पाक।
पिंड  छुड़ाने  के  लिए,   ढ़ूँढ़  रहे  हैं  ताक।।

ईश्वर  से  कहते  गधे,   यह  कैसा  अन्याय।
हमको मिलता क्यों नहीं, ढूँढ़े कोई उपाय।।

विधि का अजब विधान है, इसमें क्यों है रार। 
होगा निश्चित बस वही, जो है विधि का  सार।।

इतना तो सबको पता, विधि का अजब विधान।
फिर क्यों खाते हम फिरें, बने हुए नादान।।

विधि का अजब विधान जो, टाल सका है कौन।
ज्ञानी  तुम कितने  बड़े, फिर  भी  रहिए  मौन।।

दाहिर ही यदि सत्य है, व्यर्थ आवरण खोज। 
अक्षर-अक्षर जो लिखा,  हृदय धारिए रोज।। 

राजा दाहिर सा अडिग, मन जिसका हर बार। 
एक एक पल सीखना,   जीवन का व्यवहार।।

सभी शक्ति में चूर हैं, यही आज सिद्धांत।
जैसे  लगता हो गए, आज  बड़े   वेदांत।।

शहरों में कंक्रीट के, बने घोंसले  खूब।
गाँवो से अब दूरियाँ, जाती लेकर डूब।।

शहरों  में  जो  घोंसला,  कहते  सभी  मकान।
मानव अब धन के लिए, भाग-भाग हलकान।।

आज  दिलों में  फासला,  बढ़ा  रहे  हैं लोग।
नहीं समझते क्यों भला, लाइलाज यह रोग।।

तन-मन अर्पण कर दिया, नंदलाल गोपाल।
तेरे  बिन  मेरा  कौन  है, पूछेगा  जो  हाल।।

आया  है  नेपाल  में, प्रलय  बड़ा  गंभीर।
संकट के इस दौर में, होते  सभी अधीर।।

चहुँदिश में है दिख रहा,  बिछा मौत का जाल। 
नहीं पता  किस  ओर से, आ  जाएगा  काल।। 

बिछा मौत का जाल हम, भरते निज भंडार।
नहीं  बोध  इतना  हमें, बनते  यम के  यार।।

बिछा मौत का जाल जो, उस पर देना ध्यान।
इसके पीछे का  छिपा, भूल  आप  विज्ञान।।

व्यर्थ  मान-सम्मान की, चिंता करते लोग।
मानव में नित बढ़ रहा, अब ये भारी रोग।।

कर  सकता  कोई  नहीं, अब  मेरा अपमान।
पढ़ा  नहीं  मैंने  अभी, जो  इसका  विज्ञान।।

हर संभव कोशिश करो, व्यर्थ नहीं हो रार।
अच्छा होगा बस यही, बना रहे व्यवहार।।

क्या लेकर  जाना भला, जो इतना  है रार।
कहें मित्र यमराज जी, चुकता नहीं उधार।।

अपने ही करने लगे, अब अपनों पर वार।
बेबस होकर सह रहे, बिना विरोध प्रहार।।

कलयुग के प्रहार का, सहता मानव दंश।
पीट-पीट माथा कहे, यही हमारा अंश।।

अपने हित की बात बस, करते  रहते लोग।
कौन भला अब देखता, इक दूजे का रोग।।

सच्ची-झूठी बात तो, करते रहते  लोग।
लोनी सूरत आड़ मे, करते हैं हठयोग।।

अब अटूट रिश्ते यहाँ, झटपट जाते टूट।
बहुत कठिन है मानना, जाते कैसे लूट।।

आशा फल की व्यर्थ है, किया नहीं जब कर्म।
सबको  ही तो  है पता, क्या  है उसका  धर्म।।

कर्म तभी होंगे सुफल, जब हो पावन भाव।
बेमन  से यदि कर रहे, मिलते  गहरे  घाव।।

हमको इस परिणाम का, पहले से था बोध।
इसीलिए  आते  रहे, पग-पग पर अवरोध।।

जो भी हैं उपलब्धियाँ, उसका व्यर्थ गुमान।
रहना हमें जमीन  पर,  सदा रहे ये ध्यान।।

आज  नतीजा  सामने, श्रम  का पूरा  सार।
पर इसमें मत देखिए, अपना जीवन सार।।

हिंदी भाषा  का करें, आप  सभी  सम्मान।
बात  हमारी  मानिए, नहीं  आपको  ज्ञान।।

नहीं राष्ट्र भाषा  बनी, फिर भी पूरा गान।।
चिंता मत करिए मगर, भाषा हिंदी गान।।

माटी  चूल्हे  पर  चढ़ा, तवा  हो  रहा  गर्म। 
खुद जलकर पूरा करे, जो है उसका धर्म।।      

रोटी चढ़कर तवे पर, करती नृत्य निनाद। 
तवा पकाता है उसे, बिना सुने फरियाद।।

आँख दिखाते हो मुझे, खुदा  मानकर  आप।
चढ़ा  रहे  हो  शीश  निज,  नादानी  में पाप।।

आशय अपना साफ है, भले न समझो आप।
इसीलिए  तो  कर  रहे, झूठा  ज्ञान  प्रलाप।।

महज वस्त्र होता नहीं, निर्धारित गणवेश। 
यह बतलाता  है हमें, सब हैं  यहाँ नरेश।। 

एक रूप अरु रंग का, मोहक  सा  परिवेश। 
जब सब हों गणवेश में, लगें सभी अवधेश।।


पुस्तक 


तकनीकी    संसार  की,  माया    अपरंपार।
पुस्तक  पढ़ना  हो गया, जैसे  भारी  भार।।

पुस्तक  कोने  में  पड़ी,   है  कितनी   लाचार।
फोन सभी के हाथ में, आज समय का  सार।।

पुस्तक  हमसे  पूछती,    भूले  क्यों  मम  नाम।
मेरे बिन क्या जगत को, मिल सकता आयाम।।

पुस्तक में अब भी बसा, जीवन का संसार।
इक-इक  पन्ना  देखिए, भागे  दूर  विकार।।

पुस्तक  कहती  प्यार  से, लौटो मेरे द्वार।
तकनीकों के संग दूँ, तुमको ज्ञान अपार।।


नफरत की दीवार 


नेताओं  में  होड़  है,  बन  जाए  सरकार।
खींच रहे हैं इसलिए, नफरत की  दीवार।।

नफरत  की दीवार  का, दरक रहा आधार ।
जुटा  रहे   थे  वोट जो, किया उसी ने वार।।

नफ़रत  की  दीवार  का,      जो  करते  निर्माण।
उनको तो बस दिख रहा, केवल निज कल्याण।।

नफरत  की  दीवार  से, सत्ता  की दरकार।
बिना शर्म संकोच के, वोटों का व्यभिचार।।

जाति-धर्म  की  आड़  में,   मची  हुई   है रार।
खिंचती  कुर्सी  लोभ  में, नफरत की दीवार।।

सबसे  पहले  स्वयं का, लेते  रहिए  टोह।
रोना-धोना व्यर्थ है, मिलना हमें विछोह।।

खुद की  टोह से  ही खुले, मन के सारे भेद। 
रोता सारा संसार है, फिर क्यों करना खेद।।

खुद को जाना जिस घड़ी, सारा दूर विषाद। 
व्यर्थ आप हम ढो रहे,  झूठ-मूठ अवसाद।।


बस्ती हुई तबाह


हम सबका ही दोष है, भले निकलती आह।
आया  द्वारे  कर्मफल,   बस्ती  हुई  तबाह।।

रोना-धोना  व्यर्थ  है,            बस्ती  हुई  तबाह।
विवश आप हमने किया, प्रकृति चली इस राह।।

आया  ऐसा  जलजला,   बस्ती  हुई  तबाह।
सब मिल सबकी कर रहे, दूजे की परवाह।।

बस्ती हुई तबाह क्यों, अब तो करो विचार।
छेड़छाड़ को रोकना, आज समय दरकार।।

बस्ती हुई तबाह तो, मान लीजिए भूल।
वरना आगे झेलना, इससे गहरा शूल।।

अंतराल  का  दीखता,    कदम-कदम  पर  रंग।
कुछ  के  हिस्से  में  खुशी, और किसी के जंग।।

सकल विश्व में गूंजता, अब भारत का नाम।
और करें बदनाम वे, जो बिल्कुल  नादान।।

सकल  विश्व  में  गूँजता,  चर्चा  युद्ध  की  रोज।
कोशिश भी कुछ हो रही, चले शांति की खोज।।


जन्माष्टमी विशेष 


जन्मदिवस श्री कृष्ण का, जन्माष्टमी विशेष।
जन मानस  में हर्ष है, गिनते  सभी  निमेष।।

रात्रि आज जन्माष्टमी, ब्रज में खुशी अपार।
नंद  यशोदा  गृह  में,   जन्मे  कृष्ण  मुरार।।

आज कृष्ण जन्माष्टमी, चहुँदिश फैला हर्ष।
सबकी चाहत एक है, पाएँ कृष्ण का दर्श।।

आ जाओ श्री कृष्ण जी, करो धरा कुछ काम।
बंशी  को  भी  दीजिए,  अब  थोड़ा  विश्राम।।

हलधारी  बलराम  जी, धरा  आइए  आप।
कान्हा जी के संग में, आज मिटाओ पाप।। 

केवल कृष्ण को पूजना, नहीं आपका धर्म।
पहले आप सुधारिए, अपना जीवन  कर्म।।

कृष्ण जन्म के साथ ही, बस इतनी सी आस।
बहन-बेटियाँ   चाहतीं,  रक्षा   का   विश्वास।।

गीता  के  उपदेश  का, अगर  तनिक है ध्यान।
तभी सफल है आपका, कृष्ण जन्म विज्ञान।।

संदेशा  है  कृष्ण  का,    सुनिए  पहले  आप।
पहले हृदय पवित्र कर, फिर कर पूजा जाप।।

नंदलाल   दरबार   में,    जाते   हैं   कुछ  लोग।
जो  फैलाते  नित  नया, तरह-तरह  का  रोग।।


मृत्यु


कहें मित्र यमराज जी, मृत्यु बनी हमराह।
नाहक मैं करता नहीं, व्यर्थ कभी परवाह।।

करो मृत्यु से मित्रता, खुशियाँ मिलें अपार।
इससे  सुंदर  है  नहीं, करो  ईश  आभार।।

 मित्र बना यमराज है, जिन लोगों का आज।
डरें नहीं  वो  मृत्यु से, शीश  सजाए  ताज।।

यम जिसका भी मित्र है, आज वही सरताज। 
डरे  नहीं वो  मृत्यु से, धरे  शीश  नव  ताज।।         

यम  तो  मेरा  यार है,  और  मृत्यु  हमराह। 
अब तो करना व्यर्थ है, नाहक ही परवाह।


दुर्घटना के बाद 


दुर्घटना  के  बाद  अब, व्यर्थ  पीटना माथ।
छोड़ गया जो प्राण निज, कैसे देगा साथ।।

नीति नियम सिद्धांत सब, आते  सबको याद।
चिंतन  मनन  विचार सब, दुर्घटना  के बाद।।

दुर्घटना के बाद ही, कुछ की खुलती राह।
धन आ जाता जेब में, तब कैसी परवाह।।

दुर्घटना  के  बाद  में,      बातें  होती  खूब।
कुछ दिन चर्चा बाद फिर, जाती जैसे डूब।।

दुर्घटना के बाद में, जग  जाती  सरकार।
सत्ता शासन तंत्र का, यही श्रेष्ठ आधार।।


गुरु-शिक्षक विभेद


गुरु शिक्षक में भेद है, क्यों कर फँसते  आप।
बैठे-ठाले  ले   रहे,   अपने  सिर  पर  पाप।।

क्या गुरु शिक्षक के बिना, मिला किसी  को ज्ञान।
दोनो   एक   समान   हैं,      बनो   नहीं   नादान।।

गुरु शिक्षक इस जगत में, हैं सबसे अनमोल।
इन्हें अलग कर तोलना, व्यर्थ आप  भूगोल।।

गुरु दर्शन की दृष्टि दे,  शिक्षक शिक्षा ज्ञान।
दोनों की ही लक्ष्य है, जीवन का  उत्थान।।

गुरु शिक्षक में भेद का, जो करते हैं पाप।
रहते  खाली  हाथ हैं, सहते  हैं   संताप।।

दिव्य दृष्टि से गुरु सदा, करते  मार्ग  प्रशस्त।
शिक्षक शिक्षा  ज्ञान से, जीवन बाधा पस्त।।

गुरु  शिक्षक  को  मानिए, सबसे आप  महान।
जीवन  पथ पर  आपका, ऊँचा  होगा  मान।।


 विधवा


विधवा  को  वैसे  सदा, होता बहुत  तनाव। 
नहीं समझते हैं सभी, उसके मन का घाव।। 

विधवा का क्या दोष है, ताना देते लोग।  
समझे नहीं समाज यह, या केवल संयोग।। 

विधवा को भी दीजिए, उचित मान-सम्मान। 
आज बदलते समय का, है सद्कर्म विधान।। 

विधवा के सिर हाथ रख, संबल  दे  परिवार। 
तब उसका जीवन बने, सामाजिक सत्कार।।


राशन 


मिलता राशन मुफ्त में, करें व्यर्थ क्यों काम।                 हम कर सकते हैं  नहीं, मोदी को बदनाम।।

लेकर राशन मुफ्त का, बेंच रहे कुछ लोग।
टीका  इसका है  नहीं, बढ़ता  जाए रोग।।

राशन  की  उम्मीद में, टूटी  माँ  की  आस।
बच्चे भूखे सो गए, कर कल का विश्वास।।

जितना राशन सड़क गया, उससे कम थी भूख।
कागज में तो लिख दिया, भूख गई सब सूख।।

राशन पानी  भाव का, रखते नहीं  हिसाब।
जो  पाते  हैं  माह  में, वेतन बही किताब।।


मतदान
*                                        
करना  सबको  चाहिए,     निश्चित  ही  मतदान।
तभी प्रगति की राह पर, चल सकता अभियान।।

लालच  में  करना  नहीं, हमें  कभी  मतदान ।
उचित चयन से देश को, मिले नया  आयाम।।

कीमत  अपने  वोट की, नहीं  लगाना  आप।
और कभी मतदान को, नहीं समझना पाप।।

अगर आप हैं चाहते, अच्छी हो सरकार।
लोकतंत्र मतदान का, एकमात्र आधार।।

क्या  मेरे  मतदान  से, बन  सकती  सरकार।
भूल रहे कर्तव्य निज, सिर्फ याद अधिकार।।


गणेश जी 


पूजा  थाल  सजाइए,    ऊपर  कलश  सुजान।
रिद्धि सिद्धि संग आइए, प्रथम पूज्य भगवान।।

कलश रखो जल गंग भर, फिर कर दूजा काम।
हाथ  जोड़  विनती  करो, श्री गणेश  के  नाम।।

करो  कलश  स्थापना, सजा  आरती  थाल।
हर्ता विघ्न  गणेश  जी,  उच्च  करेंगे  भाल।।

रिद्धि-सिद्धि  के संग में, श्री गणपति महाराज।
आकर आप विराजिए, सँवर जाय मम काज।।

रिद्धि  बाँटती  सम्पदा, सिद्धि  ज्ञान  भंडार।
गणपति जी की हो कृपा, सुखी रहे संसार।।


*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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