कविता

कुछ तो बात होने वाली है

चोंचलों की बरसात होने वाली है,
नेताओं की बारात होने वाली है,
जनता को आघात होने वाली है,
चुनावी वादों की फिर से शुरुआत होने वाली है,
हाथ जोड़कर साहब अब झुकते ही जाएंगे,
पांच साल जो भूले थे,वो रिश्ते याद आएंगे,
हर कड़वी हकीकत पर मीठी बात होने वाली है,
शिलान्यासों की बाढ़ सी अब सड़कों पर आएगी,
फाइलों की तरक्की देख दुनिया चकराएगी,
कागज़ पर ही विकास की पूरी कायनात होने वाली है,
खाली जेबें ताक रही हैं कब आएगा वो रो़जगार,
पर थाली की महंगाई पर चुप बैठा है हर पैरोकार,
झूठे आंकड़ों से पेट भरने की पूरी करामात होने वाली है,
मुफ़्त की रेवड़ी बांटकर वो सोच रहे अहसान किया,
जो हक़ था हमारा असल में,उसे खैरात का नाम दिया,
रंग-बिरंगे घोषणापत्रों की नई खैरात होने वाली है,
उधर आईटी सेल के शूरवीर अब कीबोर्ड चमकाएंगे,
सच्चे तीखे सवालों को वो पल में ट्रोल कराएंगे,
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से अफ़वाहों की
भारी उल्का पात होने वाली है,
नफ़रत के हैशटैग चलेंगे,आपस में ही लड़वाएंगे,
रोटी-कपड़े के मुद्दों को वो धर्म-जात में उलझाएंगे,
सच्चाई को दफ़नाकर झूठ की ही नई बारात होने वाली है,
फिर दावों के तराजू में जज़्बात तोले जाएंगे,
बंद तिजोरियों के कुछ गुप्त ताले खोले जाएंगे,
लोकतंत्र के नाम पर फिर से शह-मात होने वाली है,
क्योंकि नेताओं की बारात और
जनता को आघात होने वाली है।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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