गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सपने दिखा रहे हैं हमें राम-राज के
भूखे हैं बेहिसाब जो ख़ुद तख़्तो-ताज के

चक्कर सियासतों का बहुत ही ख़राब है
कर देंगी ये ख़िलाफ़ ख़ुद अपने समाज के

तय डूबना है उसका सभी सूरतों में दोस्त
कप्तान एक से हैं अधिक जिस जहाज के

कुछ इसलिए भी उम्रभर घेरे रहे रक़ीब
हमको मिले न दोस्त हमारे मिज़ाज के

वो हौसला हुज़ूर कहाँ से कमाएँगे
नाखून तो खरीद लिए ख़ैर बाज के

कल की इन्हें न फ़िक्र न ही आज का ख़याल
बेख़ौफ़ बेलगाम ये बच्चे भी आज के

हमको दवाइयाँ ही खिलाईं तबीब ने
रस्ते वगरना और कई थे इलाज के

इक तो गुनाह लोग समझते हैं इश्क़ को
उस पर ये जात-पात ये बंधन समाज के

— महेश कुमार कुलदीप

रक़ीब = दुश्मन, तनीब = डॉक्टर, वैद्य

महेश कुमार कुलदीप

स्नातकोत्तर शिक्षक-हिन्दी केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक-3, ओ.एन.जी.सी., सूरत (गुजरात)-394518 निवासी-- अमरसर, जिला-जयपुर, राजस्थान-303601 फोन नंबर-8511037804

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