लघुकथा

एहतियात से रिश्ते मर नहीं जाते

सावधानी की दीवारें जब बहुत ऊँची हो जाती हैं, तो उनके पीछे रिश्ते साँस लेना भूलने लगते हैं।

अनिरुद्ध और समीर बचपन के अभिन्न मित्र थे। एक ही विद्यालय में पढ़े, एक ही मैदान में खेले और जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव साथ देखे। वक्त ने दोनों को अलग-अलग राहों पर पहुँचा दिया, लेकिन उनकी मित्रता का धागा अब भी जुड़ा हुआ था। फिर एक दिन समीर को किसी परिचित से आर्थिक धोखे की चोट लगी। उस घटना ने उसके मन में ऐसा भय भर दिया कि वह हर व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखने लगा। अब वह किसी से खुलकर बात नहीं करता, अपनी परेशानियाँ साझा नहीं करता और किसी की सहायता स्वीकार करने से पहले दस बार सोचता।

अनिरुद्ध ने कई बार उसे समझाया, “समीर, सतर्क रहना अच्छी बात है, लेकिन हर इंसान को शक की निगाह से देखना अपने ही दिल को कैद करने जैसा है।”

समीर मुस्कराकर कहता, “दुनिया बदल गई है, मित्र। अब भरोसा करने से पहले हर कदम फूँक-फूँककर रखना पड़ता है।”

धीरे-धीरे उसकी एहतियात इतनी बढ़ गई कि अपनापन भी उसे किसी स्वार्थ की आहट लगने लगा। अनिरुद्ध का फोन आता तो वह सोचता कि शायद कोई काम होगा। मित्र मिलने आता तो उसे किसी अपेक्षा का भय सताता। एक दिन अनिरुद्ध ने उदास स्वर में कहा, “मैं तुम्हारी सावधानी का सम्मान करता हूँ, लेकिन तुम्हारे संदेह से बार-बार घायल होकर अब मेरे पास कहने को कुछ नहीं बचा।”

समीर चुप रहा। उसे लगा, अनिरुद्ध भी समय के साथ बदल गया है। दोनों के बीच बातचीत कम होती गई और एक दिन ऐसा आया, जब महीनों तक कोई संपर्क नहीं हुआ।

कुछ समय बाद समीर की माँ गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं। अस्पताल के गलियारों में अकेला बैठा वह पहली बार महसूस कर रहा था कि धन और सावधानी हर संकट का समाधान नहीं होते। उसे किसी ऐसे कंधे की जरूरत थी, जिस पर सिर रखकर वह अपने मन का बोझ हल्का कर सके। अनायास उसकी उँगलियाँ अनिरुद्ध का नंबर खोजने लगीं, लेकिन आत्मसम्मान और पुराने संदेह ने उसे रोक दिया।

उसी शाम अस्पताल के दरवाजे से अनिरुद्ध भीतर आया। उसे किसी परिचित से समीर की माँ की बीमारी का पता चला था। वह बिना कोई सवाल किए आवश्यक दवाइयों और कुछ खाने-पीने के सामान के साथ पहुँचा। समीर की आँखें भर आईं। उसने धीमे स्वर में पूछा, “इतनी दूरी के बाद भी तुम चले आए?”

अनिरुद्ध ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “रिश्ते कोई व्यापार नहीं होते, समीर, जिनमें हर व्यवहार का हिसाब रखा जाए। तुम्हारी कुछ बातों से मुझे दुख जरूर पहुँचा, लेकिन तुम्हारी परेशानी जानकर मैं तुम्हें अकेला कैसे छोड़ देता?”

समीर की आँखों से आँसू बह निकले। उसे पहली बार समझ आया कि एहतियात का अर्थ दरवाजे बंद कर लेना नहीं, बल्कि समझदारी से उन्हें खोलना है। हर किसी पर आँख मूँदकर भरोसा करना उचित नहीं, लेकिन हर किसी पर संदेह करना भी बुद्धिमानी नहीं। जीवन में कुछ लोग हमारी भूलों के कारण दूर हो जाते हैं और कुछ हमारे कठिन समय में लौटकर यह याद दिलाते हैं कि सच्चे रिश्तों की जड़ें शिकायतों से गहरी होती हैं।

माँ के स्वस्थ होने के बाद समीर ने अपने व्यवहार में बदलाव लाना शुरू किया। उसने अनिरुद्ध से क्षमा माँगी और दोनों ने फिर से अपनी मित्रता को सँभाल लिया। अब समीर सतर्क रहता था, मगर अपने मन के दरवाजों पर संदेह के ताले नहीं लगाता था।

उसने जान लिया था कि एहतियात रिश्तों को मरने नहीं देती, यदि उसमें विश्वास, संवाद और संवेदना की जगह बनी रहे। रिश्तों को बचाने के लिए न आँखें बंद करनी पड़ती हैं, न दिल; बस विवेक से देखना और उदारता से समझना सीखना पड़ता है।

— डॉ. अशोक, पटना

डॉ. अशोक कुमार शर्मा

पिता: स्व ० यू ०आर० शर्मा माता: स्व ० सहोदर देवी जन्म तिथि: ०७.०५.१९६० जन्मस्थान: जमशेदपुर शिक्षा: पीएचडी सम्प्रति: सेवानिवृत्त पदाधिकारी प्रकाशित कृतियां: क्षितिज - लघुकथा संग्रह, गुलदस्ता - लघुकथा संग्रह, गुलमोहर - लघुकथा संग्रह, शेफालिका - लघुकथा संग्रह, रजनीगंधा - लघुकथा संग्रह कालमेघ - लघुकथा संग्रह कुमुदिनी - लघुकथा संग्रह [ अन्तिम चरण में ] पक्षियों की एकता की शक्ति - बाल कहानी, चिंटू लोमड़ी की चालाकी - बाल कहानी, रियान कौआ की झूठी चाल - बाल कहानी, खरगोश की बुद्धिमत्ता ने शेर को सीख दी , बाल लघुकथाएं, सम्मान और पुरस्कार: काव्य गौरव सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, कविवर गोपाल सिंह नेपाली काव्य शिरोमणि अवार्ड, पत्राचार सम्पूर्ण: ४०१, ओम् निलय एपार्टमेंट, खेतान लेन, वेस्ट बोरिंग केनाल रोड, पटना -८००००१, बिहार। दूरभाष: ०६१२-२५५७३४७ ९००६२३८७७७ ईमेल - ashokelection2015@gmail.com

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