प्रगति, छलावा और रुदन
मैं वो बरबाद इंसान हूं
जिनका बरबादियों से नाता रहा है,
रखी जिनसे उम्मीद
बस देता दिलासा रहा है,
राहें चुनी थी मैंने भी
अपनों की जन जागृति का,
हामी भरी क्या मैंने
उन्नति और विकास का
छलनी कर बैठा हृदय
सदा सुकून देती प्रकृति का,
मशीनों के इस शोर में,
मैंने अनसुनी की उस कोयल की कूक,
थी ऊंची इमारतों की हवस,
काट डाले वो सायेदार वृक्ष बेझिझक,
सोचा था लाऊंगा खुशहाली का नया सवेरा,
पर पीछे छोड़ आया कंक्रीट का एक अंधा बसेरा,
नदियां जो कल तक अमृत बहाती थीं,
आज वो जहरीले नालों में तब्दील हैं,
हवाएं जो कभी सांसों को महकाती थीं,
आज वो धुएं के कफ़न में ज़लील हैं,
पाने की चाह में मैंने क्या कुछ नहीं खोया,
सुख की नींद बेचने वाला आज खुद नहीं सोया,
अपनों को जगाने चला था जो राहगीर,
आज वो खुद ही अपनी भूल पर रोता है,
तरक्की के इस झूठे दिलासे के जाल में,
इंसान अपनी ही रूह को खोता है,
लौट आ ऐ सुकूं कि अब ये दिल हार गया,
मेरा ही रचा विकास,मेरी प्रकृति को मार गया।
— राजेन्द्र लाहिरी
