क्षणिका

क्षणिकाएं : शब्द श्रंखला- अधर्म

१) सत्य थोड़ी देर चुप कर क्या बैठा
अधर्म के तो मानो पंख ही लग गये
खुद बन बैठा वह धर्माचार्य
अल्पकाल के लिए भाग्य जग गये।

२) आया समय यह कैसा बेढंगा
हर तरफ है झूठ का बोलबाला
सत्य कहीं कोने में दुबका पड़ा है
जैसे जुबां पर पड़ गया हो ताला ।

३) न्याय व्यवस्था भी चरमरा गयी है
भ्रष्टाचार ने गहरी पैठ बनाई
दशकों लग जाते निर्णय आने में
विश्वास की नैया डगमगाई ।

४) अधर्मी, कुकर्मी सब एक हो जाते
कर्तव्य मार्ग पर रोड़े अटकाते
खुद को सही बताने की कोशिश में
किसी भी हद तक गिर जाते ।

५) राजनीतिज्ञो की है अपनी मजबूरी
कैसे भी आए बस सत्ता जरुरी
धर्म-कर्म से न कुछ इन्हें लेना-देना
नौकरशाही करे बस जी हजूरी।

— नवल अग्रवाल

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई

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