हास्य व्यंग्य

चाटुकारिता में पी.एच्-डी.

शीर्षक को पढ़कर हँसी आ रही होगी न आपको ? सही-सही बताना आ रही है ना? क्या आपको वाकई में लगता है कि हमारे देश की शिक्षा प्रणाली में चाटुकारिता (Sycophancy) की शिक्षा देने का प्रचलन है। यदि है तो हमारे देश में ऐसे कौन-कौनसे विश्वविद्यालय है जो इस प्रकार की शिक्षा व ज्ञान विद्यार्थियों में बांट रहे हैं। और-तो-और इसका पाठ्यक्रम (Syllabus) कैसा होता होगा? ऐसी शिक्षा को ग्रहण करने के लिए विद्यार्थी में कौन-कौनसी योग्यता होनी चाहिए? और वे कौनसे शिक्षक होते है जो ऐसी शिक्षा विद्यार्थियों में बांटते है। जिन-जिन विद्यार्थियों ने इस प्रकार की शिक्षा को ग्रहण किया है वे जीवन के किन-किन क्षेत्रों में अपनी सेवाएँ दे सकते हैं? यह अजीब प्रश्न मस्तिष्क में काफी दिनों से चल रहा था सोचा की आप सभी के साथ साझा करके इसका हल प्राप्त कर सकूँ।
जहाँ तक मुझें जानकारी है कि मैंने तो आज तक इस प्रकार की किसी भी शिक्षा प्रणाली के बारे में नहीं सुना। किस कॉलेज अथवा संस्थान द्वारा इस प्रकार की शिक्षा दी जाती है यह भी नहीं जानता। लेकिन, हाँ इतना जरूर जानता हूँ कि इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त डिग्री होल्डर तो अपने आसपास अक्सर विचरते हुए देखे जा सकते हैं। बड़े-बड़े संस्थानों, मल्टीनेशनल कम्पनीज एवं कॉपरेट क्षेत्र में ऐसे डिग्री होल्डर्स की संख्या बहुतायत होती है। ये दिखने में तो आकर्षक व अच्छे घरों से दिखाई देते हैं। जहाँ पर ये कार्यरत होते हैं वहाँ अपना अधिक-से-अधिक समय मालिक (Boss) के साथ बिताना एवं उन्हें खुश रखने में चला जाता है। इनका महत्त्वपूर्ण कार्य मालिक की हाँ में हाँ मिलाना होता है। बॉस की पत्नी, माताजी, पिताजी के साथ-साथ उनके बच्चों तक की पूरी जानकारी रखना ये अपना परम कर्त्तव्य समझते हैं। साथ ही अपने बॉस के खाने में उनकी पसन्द-नापसन्द तक की जानकारी जुटा कर उनके स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए खाने-पीने की व्यवस्था करने एवं उसी व्यवस्था से अपना भी पेट भरने में भी ये निर्पुण होते हैं। और हाँ, सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि ये सब करने में उनकी जेब से कुछ भी खर्च नहीं होता।
विशेष बात तो यह है कि मालिक (Boss) भी साथ में रहते-रहते इनके इतने आदि हो जाते हैं कि इनके बगैर रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते। इनके बगैर रहना जैसे बिना गुड़ के हलवे को खाना। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि शायद बॉस ने ही इन्हें पैदा किया हो। इसी वजह से कार्यस्थल पर इनका रूतबा मालिक से कम नहीं होता। अपने सहयोगियों (colleagues) से तो ये कुछ भी नहीं कहते, लेकिन उनके बारे में मालिक के कान भर-भर कर किसी भी सहयोगी को बिना हरिद्वार पहुँचायें गंगाजी में डूबाने की क्षमता तक रखते हैं। और हाँ, किसी कार्य को कैसे किया जाए इसकी जानकारी न होते हुए भी दूसरों के कार्यों में अपनी टांग घुसेड़ने को अपना परम सौभाग्य समझते हैं। निजी अनुभव के आधार पर मैं आप सभी को बताना चाहता हूँ कि पिछले कई वर्षों के विभिन्न सेवाकालों में मेरा सामना ऐसे डिग्री होल्डरों से अनेकों बार हो चुका हैं।
जैसाकि मैंने अपने पूर्व आलेख ”कार्यों का वर्गीकरण का आधार हो योग्यता…!!“ में भी बताया था कि सिर्फ-और-सिर्फ ऐसे डिग्री होल्डरों के होने की वजह से ही योग्य एवं निष्ठावान कर्मचारी की कार्यस्थल (किसी भी संस्थान) में कदर नहीं होती है। इन्हीं की वजह से योग्य व्यक्ति अपने आपको डरा-डरा हुआ महसूस करता है। योग्य व्यक्तियों के बारे में कहा जाता है कि जो सीमित संसाधनों (Limited Resources) में भी कुछ नया करिश्मा करके दिखा सकते हैं और वहीं दूसरी ओर अयोग्य व्यक्ति अनेक साधनों के होते हुए भी कुछ विशेष नहीं कर पाता।
इन्हीं डिग्री होल्डरों के संस्थान में होने के कारण आज कुशल कर्मचारियों की योग्यता, प्रतिभा एवं क्षमताओं का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। उनकी शंकाओं का भी उचित समाधान नहीं हो पाता। सही तरीके से कार्य करना भी प्रायः उन्हें भार स्वरूप प्रतीत होता है। अपने कार्यो के प्रति जितनी रुचि, उमंग, उत्साह, सजगता एवं सतर्कता उनमें होनी चाहिये, वह अब देखने को नहीं मिलती। इसी मनोस्थिति के चलते हुए कोई भी कर्मचारी अपने आसपास बुरा होता हुआ देखते हुए भी मात्र मनोबल के अभाव अथवा डर के मारे बुराई को बुरा कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। उसकी भावनाओं, दुविधाओं एवं मनःस्थिति को समझने का समय मालिकों अथवा प्रबन्धकों के पास होता ही नहीं।
मित्रों! एक बात आज तक मुझें समझ में नहीं आयी कि मालिकों अथवा प्रबन्धकों को ऐसी कौनसी चुल (खुजली) होती है कि उन्हें अपने आसपास ऐसे डिग्री होल्डर (चापलुस प्रवृत्ति) लोगों को रखने की आवश्यकता पड़ती है। क्या उनके आसपास बुद्धिमान लोगों की कमी हैं? हो सकता है कि शायद स्वयं इनमें बुद्धि की कमी हो या यह भी हो सकता है कि अपना विवेक ये काम में लेना ही नहीं चाहते। विचार सागर की ये पंक्तियाँ यहाँ पर उचित प्रतीत होती हैंः-
”चंदण री चिमटी भली, गाडो भलो न काठ।
चातर तो एक ही भलो, मूरख भला न साठ।।“
अर्थात्- ”समझदार सहयोगी अथवा दोस्त हो तो एक ही काफी है। मुर्ख अगर साठ हो तब भी किसी काम के नही होते। जिस तरह चुटकी भर चन्दन की बराबरी गाड़ी भर लकड़ी भी नही कर सकती वैसे ही चतुर व्यक्ति की बराबरी साठ मुर्ख मिलकर भी नही कर सकते। इसलिए हमेशा बुद्धिमान लोगों की संगत कीजिए एवं कपटी व चापलुस प्रवृत्ति के व्यक्तियों से दूर रहिये।“

— राजीव नेपालिया (माथुर)

राजीव नेपालिया

401, ‘बंशी निकुंज’, महावीरपुरम् सिटी, चौपासनी जागीर, चौपासनी फनवर्ल्ड के पीछे, जोधपुर-342008 (राज.), मोबाइल: 98280-18003

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