त्योहार की परंपराओं का निर्वाह या समय के साथ उनका पुनर्मूल्यांकन?
सावन का महीना, गणेश चतुर्थी, पितृपक्ष, नवरात्रि, दशहरा, दीपावली और भाई दूज! अगस्त से नवंबर, बल्कि दिसंबर तक हमारे देश में कोई न कोई त्योहार आता ही रहता है। त्योहार हमारी संस्कृति, सामाजिकता और सामूहिक उल्लास का अभिन्न हिस्सा हैं। लेकिन कभी हमने ठहरकर यह सोचने की कोशिश की है कि इन त्योहारों और उनसे जुड़ी परंपराओं का मूल उद्देश्य क्या था? और क्या आज भी उन्हें उसी रूप में निभाना आवश्यक है?
आइए, त्योहार को सरल शब्दों में समझने का प्रयास करें।
सामान्य अर्थ में, किसी विशेष तिथि पर किसी विशेष कार्य को करने की परंपरा ही त्योहार का एक रूप है। लेकिन जिस समय ये परंपराएँ बनी थीं, उस समय की सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियाँ आज से बहुत अलग थीं। तब कुछ काम विशेष अवसरों पर सामूहिक रूप से करना सहज था। इससे आपसी मेलजोल बढ़ता था, मनोरंजन होता था और संभव है कि कुछ परंपराओं के पीछे व्यावहारिक स्वास्थ्य संबंधी कारण भी रहे हों।
समस्या परंपराओं में नहीं, बल्कि उन्हें उनके मूल संदर्भ से काटकर आँख मूँदकर निभाने में है। कुछ रिवाजों या प्रथाओ को डिकोड करने का प्रयास किया है जैसे की
हमारे यहाँ रसोई में जाने से पहले स्नान करने और स्वच्छता का ध्यान रखने की परंपरा रही है। पुराने समय में न आधुनिक शौचालय थे, न घरों में आज जैसी साफ-सफाई की सुविधाएँ। ऐसे में व्यक्तिगत स्वच्छता का महत्त्व समझाने के लिए नियमों और धार्मिक मान्यताओं का सहारा लिया गया होगा। हालाँकि, हर परंपरा के पीछे कोई एक निश्चित वैज्ञानिक कारण था, ऐसा दावा करने के लिए ऐतिहासिक प्रमाण आवश्यक हैं। किन्तु आज कल हर व्यक्ति व्यक्तिगत साफ सफाई और का ख्याल हर समय रखता है तो इस परंपरा मे बदलाव होना चाहिए |
इसी तरह, पहली रोटी अग्नि को समर्पित करने की परंपरा भी रही है। इसके पीछे धार्मिक आस्था, अग्नि के प्रति सम्मान और कृतज्ञता जैसे भाव हो सकते हैं। जीवन में अग्नि की महत्ता हो स्वीकार करने की शिक्षा देना भी एक कारण हो सकता है किंतु मुझे लगता है चूंकि पहली रोटी तवा ठीक से गर्म न होने की वजह से शायद कच्ची रह जाए या ज्यादा गर्म होने के कारण जल जाने की संभावना भी हो सकती थी तो उसे अग्नि को समर्पित करने को कहा गया और जिसका उस समय में सहज रूप से पालन भी हो जाता था क्योंकि चूल्हे पर ही रोटी बनती थी रोटी बनाई और उसे सीधा चूल्हे में डाल दिया ।
लेकिन आज के संदर्भ में सोचिए। लकड़ी या उपलों के चूल्हे की जगह गैस स्टोव और इंडक्शन ने ले ली है। ऐसे में पहली रोटी को जलते चूल्हे में डालना न तो आवश्यक है, न ही हर परिस्थिति में सुरक्षित। गैस बर्नर में रोटी डालने से उसे नुकसान पहुँच सकता है।
तो क्या अग्नि के प्रति सम्मान जताने का कोई दूसरा तरीका नहीं हो सकता? गैसे या इंडक्शन जो भी प्रयोग हो उसका उपयोग सावधानी से किया जाए। संसाधन बर्बाद न हो इन बातों का ध्यान रखा जाय। उनका रख रखाव ठीक से किया जाए जिससे कोई दुर्घटना न हो।
पहली रोटी गाय को रोटी देना । आज हम फ्लैट्स में रहते हैं। हर दिन गाय को रोटी कहां से दे सकते हैं ये नियम निभाना कठिन है। किसी भी भूखे जानवर को या गरीब को रोटी दे कर भी पुण्य कमाया जा सकता है। पुराने जमाने मे हर दूसरे घर मे गाय होती थी तो इसका निर्वाह भी हो जाता था| आज के समय मे अगर चाहे तो किसी गोशाला को मासिक रूप से दान भी दे सकते है समय के साथ बदलाव |परंपरा का उद्देश्य बचा रहे, भले ही उसका तरीका बदल जाए।
अब कुछ बात त्योहारों की भी हो जाए
होलिका दहन : आस्था के साथ पर्यावरण की चिंता भी
होली से पहले होलिका दहन होता है। वसंत ऋतु के आगमन और शीत ऋतु की विदाई के साथ जुड़ा यह पर्व हमारी सांस्कृतिक स्मृति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
पुराने समय में ग्रामीण जीवन में सूखी लकड़ियाँ, गिरी हुई टहनियाँ और कृषि अवशेष उपलब्ध होते थे। सामूहिक अग्नि के आसपास लोग जुटते, मिलते-जुलते और उत्सव मनाते थे। हालाँकि, होलिका दहन की धार्मिक परंपरा को केवल मौसम या सूखी लकड़ियों के उपयोग से जोड़कर नहीं देखा जा सकता; इसके पीछे पौराणिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ भी हैं।
लेकिन आज के शहरों की स्थिति पर गौर कीजिए। वनों का तेजी से कटना , सिकुड़ते हरित क्षेत्र, बढ़ता वायु प्रदूषण और लकड़ी की बढ़ती माँग! ऐसे में पेड़ों की हरी डालियाँ काटकर या जरूरत से अधिक लकड़ी जलाकर उत्सव मनाना कहाँ की समझदारी है?
यह मान लेना भी ठीक नहीं कि पुराने समय में पेड़ों की अधिकता के कारण होलिका दहन से होने वाला प्रदूषण अपने आप संतुलित हो जाता था। पेड़ पर्यावरण के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन वे हर तरह के प्रदूषण को तत्काल निष्प्रभावी नहीं कर सकते।
किंतु आज के परिपेक्ष में जबरदस्ती लड़कियों काटकर प्रदूषण उत्पन्न करना कहां की समझदारी है क्यों लकीर के फकीर है हैं हम आज भी। उन जमाने में तो जब यह परंपराएं होती थी हर घर में पेड़ होते थे तो जितना भी जलने से कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होता था उसका हजार गुना पेड़ों से हमें ऑक्सीजन मिल जाता था किंतु अब क्या है कंक्रीट के जंगल में होलिका दहन सोच कर देखिए हमारे पूर्वजों ने हमें जो त्यौहार दिए थे वह उसे समय की देशकाल स्थिति के अनुसार थे जो रिवाज दिए थे जो परंपराएं दी थी उसे समय की स्थिति में अनुकूल थी।
आस्था अपनी जगह है, पर्यावरण की चिंता अपनी जगह। दोनों में टकराव क्यों हो? प्रतीकात्मक होलिका दहन, सीमित और उचित ईंधन का उपयोग तथा हरी लकड़ी न काटने जैसे विकल्प अपनाकर हम त्योहार की भावना भी बचा सकते हैं और प्रकृति का ध्यान भी रख सकते हैं। हर व्यक्ति कपूर लोहबान धूप आदि परिवार के साथ जला कर घर को पवित्र करे| यह भी एक तरीका हो सकता है |
होली के रंग और रसोई की जिम्मेदारी अब बात होली खेलने की।
वसंत उत्सव में होली खेलने के लिए प्राकृतिक रंग बनाए जाते थे टेसू के फूल और हरसिंगार के फूलों की डडियोंसे जिनसे हमारी स्किन पर जो भी गंदगी या किसी प्रकार का चर्म रोग आ रहा हो वह ठीक हो जाए और साथ में थोड़ा आमोद प्रमोद भी हो जाए |
दूसरी परंपरा पर भी बात होनी चाहिए—पकवान बनाने की जिम्मेदारी।
पहले जब बाजार में हर चीज आसानी से उपलब्ध नहीं थी, सुविधाएँ सीमित थीं और परिवारों की जरूरतें अलग थीं, तब घर में खाद्य सामग्री बनाकर सुरक्षित रखना व्यावहारिक हो सकता था। कृषि प्रधान समाज में मौसम और फसल के अनुसार भोजन तैयार करने की अपनी उपयोगिता थी।
लेकिन आज स्थिति बदल गई है। बाजार में साल भर लगभग हर चीज उपलब्ध है। घरों में जगह सीमित है, कामकाजी महिलाओं के पास समय कम है और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है।
इसके बावजूद त्योहार आते ही घर की गृहिणी के सामने मानो एक अदृश्य फरमान जारी हो जाता है—गुजिया भी बननी चाहिए, चिप्स भी, पापड़ भी और पकवानों की पूरी फेहरिस्त भी!
ऑफिस में पूरा सप्ताह काम करने के बाद मिलने वाली एक छुट्टी भी रसोई के नाम। बाकी परिवार त्योहार का आनंद ले, मेहमानों से मिले, आराम करे; और गृहिणी त्योहार की तैयारी में ही लगी रहे। फिर इसे परिवार का उत्सव कैसे कहें?
जो परंपरा कभी सुविधा और सामूहिक आनंद का माध्यम रही होगी, वही आज यदि किसी एक व्यक्ति के लिए अतिरिक्त श्रम और मानसिक तनाव का कारण बन जाए, तो उसके स्वरूप पर विचार करना जरूरी है।
आलू की फसल होती थी प्रचुर मात्रा में आलू होने से बहुत से पकवान और सूखे नाश्ते जैसे आलू के चिप्स आलू के पापड़ आलू की भुजिया यह सब बनाकर स्टोर कर लिया जाता है क्योंकि उसे जमाने में कोल्ड स्टोरेज नहीं होते थे कृषि प्रधान देश था जो फसल अभी उत्पन्न हुई है उसे दीर्घकाल तक सहज के रखना इन चीजों को प्रथाओं में परंपराओं में रचा बसा दिया गया था|
लेकिन अब वक्त है कि इसका वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए पहले लोगों के पास साधन कम थे और समय प्रचुर मात्रा में था तो वह त्यौहार को इस तरह मानते थे किंतु अब जब उलट है साधन संसाधन प्रचुर मात्रा में है और समय काम है तो क्यों ना त्योहारों को कुछ इस तरह मनाया जाए जिसमें संसाधन बहुतायत से खर्च हो और समय की बचत हो परिवार के लोग एक दूसरे के साथ स्नेह सौहार्द से समय बिताए। कुछ सकून के पल और पर्यावरण भी ठीक रहे। समय की बचत हो।
सब साथ में बैठ कर खाना खाये। हैल्दी खाये स्विगी जोमेटो पर से खाने वाली फैमिली साथ मिल कर कुछ कम तला भुना सादा खाना साथ में खाए। त्योहार का अर्थ केवल पकवानों की संख्या नहीं, बल्कि साथ बिताए गए समय की गुणवत्ता भी है।
जब साधन कम थे, समय अधिक था; अब समय कम है, साधन अधिक | पहले जीवन की गति धीमी थी। संयुक्त परिवारों और सामुदायिक जीवन में काम बाँटने की गुंजाइश भी अधिक हो सकती थी। आज परिवार छोटे हैं, कामकाजी लोगों की दिनचर्या व्यस्त है और समय सबसे मूल्यवान संसाधनों में से एक बन गया है।
दीपावली मे घर की साफ सफाई की परंपरा :
घर का कोना कोना साफ करो | अच्छी बात है साफ होना ही चाहिए लेकिन त्योहारों के समय मे जब वर्किंग क्लास को ऑफिस मे भी देर तक रुकना होता है फिर घर का कोना कोना साफ करना या करवाना काफी कठिन और मूड को तनाव देने वाला होता है | घर को थोड़ा थोड़ा साप्ताहिक , मासिक और वार्षिक सफाई के हिसाब से साफ करें | किसी खास दिन ही सब साफ हो इस परंपरा पर पुनर्विचार होना ही चाहिए |
जब परिस्थितियाँ बदल गई हैं, तो उत्सव मनाने के तरीकों में बदलाव क्यों नहीं होना चाहिए?
मैं यह नहीं कह रही कि परंपराएँ छोड़ दीजिए। मेरा आग्रह केवल इतना है कि उन्हें समझिए, उनके उद्देश्य को पहचानिए और फिर तय कीजिए कि आज उन्हें किस रूप में निभाना सबसे उचित होगा।
हर पुरानी परंपरा अवैज्ञानिक नहीं होती और हर नई चीज बेहतर नहीं होती। जरूरत है विवेकपूर्ण चुनाव की—न अंधानुकरण, न अंधविरोध।
त्योहार ऐसे भी मनाकर देखिए!
कल्पना कीजिए, दीपावली पर परिवार के सभी सदस्य मिलकर घर सजाएँ। स्वच्छता रखें, दीप जलाएँ, पूजा करें और एक-दूसरे के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें। सुगंधित धूप या अन्य सामग्री का उपयोग अपनी सुविधा और सुरक्षा के अनुसार करें। फिर सब लोग मिलकर सादा, स्वादिष्ट और संतुलित भोजन बनाएँ या साथ बैठकर खाएँ।
स्विगी और जोमैटो से खाना मँगवाने में कोई बुराई नहीं, लेकिन कभी-कभी परिवार के सभी सदस्य मिलकर भी रसोई सँभालें। कोई सब्जी काटे, कोई आटा गूँधे, कोई मेज सजाए और कोई बर्तन समेटे। त्योहार का श्रम भी साझा हो और आनंद भी।
और क्यों न कभी त्योहार पर किसी गाँव की सैर की जाए? किसी जिम्मेदार ग्रामीण पर्यटन केंद्र या स्थानीय परिवार के आतिथ्य में ग्रामीण जीवन को करीब से समझा जाए। स्थानीय नियमों, निजता और मेजबान की सहमति का सम्मान करते हुए मिट्टी के घर, खेत, चूल्हे पर बना भोजन और गाँव की जीवनशैली का अनुभव लिया जाए।
बच्चे, जो आलू को अब तक केवल सुपरमार्केट की टोकरी में देखते आए हैं, जानें कि वह मिट्टी से कैसे निकलता है। मटर की फली पौधे पर कैसे लगती है, सरसों के खेत कैसे लहलहाते हैं और बीज से तेल बनने तक की प्रक्रिया क्या है—यह सब उनके लिए किसी रोमांचक पाठशाला से कम नहीं होगा।
ऐसा अनुभव केवल मनोरंजन नहीं, प्रकृति, कृषि और मेहनत के प्रति सम्मान भी सिखा सकता है। हाँ, ग्रामीण परिवारों की दिनचर्या को केवल हमारे मनोरंजन का साधन न बनाया जाए; उनके श्रम और आतिथ्य का उचित सम्मान भी हो।
त्योहारों पर जरूरतमंदों की सहायता करना, बुजुर्गों के साथ समय बिताना, बच्चों को लोककथाएँ सुनाना, परिवार के साथ खेलना या किसी पुराने मित्र से मिलने जाना भी उत्सव का हिस्सा बन सकता है।
आखिर त्योहार का असली आनंद महँगे पकवानों, रोशनी की चकाचौंध और रस्मों की लंबी सूची में ही तो नहीं है।
परंपरा का सम्मान करें, विवेक का भी इस्तेमाल करें
हमारे पूर्वजों ने अपने समय की परिस्थितियों में जीवन को व्यवस्थित करने, समाज को जोड़ने और आनंद के अवसर बनाने के लिए अनेक परंपराएँ विकसित कीं। उनके प्रति सम्मान होना चाहिए। लेकिन सम्मान का अर्थ यह नहीं कि हम हर परंपरा को उसके मूल उद्देश्य और वर्तमान परिस्थितियों पर विचार किए बिना निभाते रहें।
समय के साथ समाज बदलता है, साधन बदलते हैं, पर्यावरण बदलता है और परिवारों की जरूरतें भी बदलती हैं। ऐसे में परंपराओं के रूप में बदलाव आना स्वाभाविक है।
यदि किसी परंपरा से प्रेम, सद्भाव, कृतज्ञता और सामूहिक आनंद बढ़ता है, तो उसे संजोएँ। यदि उसके किसी पुराने तरीके से पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है, अनावश्यक खर्च बढ़ता है या परिवार के किसी सदस्य पर असमान बोझ पड़ता है, तो उसका बेहतर विकल्प खोजें।
त्योहारों को बोझ नहीं, आनंद का अवसर बनाइए। आस्था को विवेक से जोड़िए, परंपरा को समय के साथ चलने दीजिए और उत्सव में प्रकृति तथा मनुष्य—दोनों के लिए जगह रखिए। आखिर त्योहार हमारे जीवन को सुंदर बनाने के लिए हैं, जीवन को त्योहारों की रस्मों के बोझ तले दबाने के लिए नहीं। तो अगली बार त्योहार मनाएँ, जरूर मनाएँ—लेकिन केवल लकीर के फकीर बनकर नहीं, बल्कि सोच-समझकर, मिल-जुलकर और खुशियाँ बाँटकर।
— प्रज्ञा पाण्डेय मनु
