शिक्षा एवं व्यवसाय

देश के तीन आईआईटी में मेडिकल साइंस और इंजीनियरिंग का संगम: डॉक्टर नहीं, मेडिकल इंजीनियर तैयार करने की पहल

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तेजी से तकनीक पर निर्भर होता जा रहा है। आज अस्पतालों में सीटी स्कैन, एमआरआई , आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस , रोबोटिक्स, बायो-सेंसर और अत्याधुनिक डायग्नोस्टिक मशीनों का उपयोग बढ़ रहा है। ऐसे में चिकित्सा और इंजीनियरिंग के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।

इसी दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास, आईआईटी खड़गपुर और आईआईटी कानपुर चिकित्सा विज्ञान तथा इंजीनियरिंग को एक साथ लाने की दिशा में काम कर रहे हैं। इन संस्थानों का उद्देश्य ऐसे विशेषज्ञ तैयार करना है जो मानव शरीर की कार्यप्रणाली और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की तकनीक—दोनों को समझ सकें।

## चिकित्सा और इंजीनियरिंग के बीच तालमेल क्यों जरूरी?

कल्पना कीजिए कि किसी मरीज की सीटी स्कैन रिपोर्ट में एक हिस्सा स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा है। डॉक्टर को यह समझने में कठिनाई हो सकती है कि इसका कारण मशीन की तकनीकी समस्या है या मरीज की बीमारी। दूसरी ओर, मशीन बनाने वाले इंजीनियर को उस चिकित्सकीय परिस्थिति की पूरी जानकारी नहीं हो सकती।

ऐसी स्थिति में चिकित्सा और तकनीक, दोनों का ज्ञान रखने वाले विशेषज्ञ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे डॉक्टरों और इंजीनियरों के बीच बेहतर संवाद स्थापित करने, मशीनों की उपयोगिता बढ़ाने और रोगों की पहचान को अधिक सटीक बनाने में मदद कर सकते हैं।

हालांकि, ऐसे विशेषज्ञ डॉक्टरों और पारंपरिक इंजीनियरों का स्थान लेने के लिए नहीं, बल्कि उनके साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार किए जाते हैं।

## आईआईटी मद्रास: मेडिकल साइंस और इंजीनियरिंग का नया संगम

आईआईटी मद्रास ने मेडिकल साइंस एंड टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में विशेष शैक्षणिक पहल की है। संस्थान का उद्देश्य चिकित्सा विज्ञान, इंजीनियरिंग और आधुनिक तकनीक के बीच सहयोग को मजबूत करना है।

यहां मेडिकल साइंस एंड इंजीनियरिंग से संबंधित पाठ्यक्रमों में मानव शरीर की कार्यप्रणाली, गणितीय मॉडलिंग, क्लिनिकल न्यूरोसाइंस और मेडिकल इमेजिंग जैसे विषय शामिल हैं। इन विषयों के माध्यम से विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर मिलता है कि इंजीनियरिंग के सिद्धांतों का उपयोग मानव शरीर, रोगों की पहचान और चिकित्सा अनुसंधान में किस प्रकार किया जा सकता है।

आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटि का मानना है कि तकनीकी संस्थानों को चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। चिकित्सा उपकरणों और स्वास्थ्य तकनीक के क्षेत्र में देश की क्षमता बढ़ाना भारत की दीर्घकालिक जरूरत है।

## आईआईटी खड़गपुर: चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान की दिशा में कदम

आईआईटी खड़गपुर ने चिकित्सा विज्ञान और तकनीक के समन्वय के क्षेत्र में लंबे समय से काम किया है। यहां 2001 में स्कूल ऑफ मेडिकल साइंस एंड टेक्नोलॉजी की शुरुआत हुई थी।

संस्थान का एमएमएसटी कार्यक्रम विशेष रूप से ऐसे चिकित्सकों के लिए तैयार किया गया था, जो इंजीनियरिंग और भौतिक विज्ञान के ज्ञान के माध्यम से अपने चिकित्सा कौशल को और बेहतर बनाना चाहते हैं।

आईआईटी खड़गपुर ने अपने परिसर में डॉ. बी. सी. रॉय इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के माध्यम से चिकित्सा सुविधाओं और अनुसंधान को आगे बढ़ाने की दिशा में भी काम किया है।

यहां मेडिकल इमेजिंग, मॉलिक्यूलर इमेजिंग, बायोमटेरियल्स, इम्प्लांट्स, बायोफिजिक्स, कैंसर की शुरुआती पहचान, इम्यूनो-टेक्नोलॉजी और क्लिनिकल बायोमार्कर जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान की संभावनाएं हैं।

इन प्रयासों का व्यापक उद्देश्य चिकित्सा क्षेत्र में नई तकनीकों के विकास को बढ़ावा देना और अनुसंधान को वास्तविक मरीजों की जरूरतों से जोड़ना है।

## आईआईटी कानपुर: गंगवाल स्कूल ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी

आईआईटी कानपुर का गंगवाल स्कूल ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी चिकित्सा शिक्षा, उच्च स्तरीय चिकित्सा अनुसंधान और इंजीनियरिंग तकनीक को एक मंच पर लाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

इस प्रकार के संस्थानों में भविष्य की चिकित्सा तकनीकों के विकास, उन्नत डायग्नोस्टिक प्रणालियों, मेडिकल रोबोटिक्स, बायोमेडिकल उपकरणों और एआई आधारित स्वास्थ्य सेवाओं पर काम करने की व्यापक संभावनाएं हैं।

इसका उद्देश्य केवल नई मशीनें बनाना नहीं है, बल्कि यह समझना भी है कि मरीजों की वास्तविक जरूरतों के अनुसार तकनीक को कैसे अधिक उपयोगी, सुरक्षित और प्रभावी बनाया जा सकता है।

## क्या भविष्य में मेडिकल इंजीनियरों की मांग बढ़ेगी?

चिकित्सा विज्ञान में तकनीकी बदलावों के कारण ऐसे विशेषज्ञों की मांग बढ़ने की संभावना है, जिन्हें बायोमेडिकल इंजीनियरिंग, मेडिकल इमेजिंग, मेडिकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोइन्फॉर्मेटिक्स, रोबोटिक्स और स्वास्थ्य उपकरणों के डिजाइन का ज्ञान हो।

इन क्षेत्रों में प्रशिक्षित विशेषज्ञ अस्पतालों, चिकित्सा उपकरण बनाने वाली कंपनियों, अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों और स्वास्थ्य तकनीक से जुड़ी कंपनियों में काम कर सकते हैं।

यह समझना आवश्यक है कि मेडिकल इंजीनियरिंग और एमबीबीएस अलग-अलग शैक्षणिक तथा व्यावसायिक रास्ते हैं। इंजीनियरिंग की डिग्री अपने आप किसी व्यक्ति को मरीजों का निदान करने या उनका इलाज करने का अधिकार नहीं देती। इसी प्रकार, डॉक्टरों को भी चिकित्सा अभ्यास के लिए निर्धारित योग्यताओं और नियमों का पालन करना होता है।

## भारत के लिए स्वदेशी मेडिकल टेक्नोलॉजी क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में चिकित्सा उपकरणों और स्वास्थ्य तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की आवश्यकता है। आधुनिक स्कैनर, वेंटिलेटर, पेसमेकर और जीवन रक्षक प्रणालियों जैसे उपकरणों के विकास, निर्माण और रखरखाव में घरेलू क्षमता मजबूत होने से आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

इसके अतिरिक्त, देश की परिस्थितियों के अनुरूप सस्ती और भरोसेमंद तकनीक विकसित की जा सकती है। ग्रामीण अस्पतालों, छोटे स्वास्थ्य केंद्रों और दूरदराज के क्षेत्रों में ऐसी तकनीक विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है।

यदि भारतीय संस्थान चिकित्सा विशेषज्ञों, इंजीनियरों और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाते हैं, तो नई खोजों को प्रयोगशालाओं से अस्पतालों तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।

## दुनिया से क्या सीख सकते हैं?

अमेरिका का मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी इंजीनियरिंग, कंप्यूटिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और चिकित्सा तकनीक के क्षेत्र में अनुसंधान के लिए प्रसिद्ध है। एमआईटी स्वयं पारंपरिक मेडिकल स्कूल की तरह एमबीबीएस की डिग्री देने वाला संस्थान नहीं है, लेकिन चिकित्सा संस्थानों और अनुसंधानकर्ताओं के साथ सहयोग करके स्वास्थ्य सेवाओं के लिए नई तकनीक विकसित करने में योगदान देता है।

यह उदाहरण बताता है कि चिकित्सा विज्ञान में प्रगति के लिए डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों का सहयोग कितना महत्वपूर्ण है।

आईआईटी मद्रास, आईआईटी खड़गपुर और आईआईटी कानपुर की पहल भारत में चिकित्सा विज्ञान और इंजीनियरिंग के बीच बढ़ते संबंधों को दर्शाती है। भविष्य की स्वास्थ्य सेवाओं में केवल बेहतर डॉक्टर और बेहतर मशीनें ही पर्याप्त नहीं होंगी; ऐसी तकनीक भी जरूरी होगी जिसे मरीजों की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया हो।

इन संस्थानों के प्रयास चिकित्सा अनुसंधान, स्वदेशी उपकरण निर्माण और स्वास्थ्य तकनीक में नए अवसर पैदा कर सकते हैं। विद्यार्थियों के लिए भी यह एक उभरता हुआ क्षेत्र है, जिसमें विज्ञान, गणित, इंजीनियरिंग और मानव स्वास्थ्य के प्रति रुचि रखने वाले युवाओं को नए रास्ते मिल सकते हैं।

भविष्य की चिकित्सा में डॉक्टर और इंजीनियर एक-दूसरे के विकल्प नहीं, बल्कि सहयोगी होंगे। यही सहयोग अधिक सटीक निदान, बेहतर उपचार और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

— डॉ. विजय गर्ग

*डॉ. विजय गर्ग

शैक्षिक स्तंभकार, मलोट

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