कविता

कविता

तेरी यादों का कारवां दिल के आंगन में ठहरा हुआ है,
तेरी बातों की नर्मी अब भी मेरी सांसों में बसी हुई है।

कभी जो तू मेरे नाम की रोशनी आंखों में सजाती थी,
अब उसी आंख में एक अनजानी सी दूरी नजर आती है।

इश्क ने तो हमें सिखाया था हर दर्द में मुस्कुराना,
पर तेरी बेरुखी ने सिखा दिया तन्हा कैसे जीना है।

हमने तो चाहा था तुझे रूह की पाकीजगी से,
तूने तो चाहत को भी वक्त की मजबूरी बना दिया।

तेरी मोहब्बत में वो कशिश थी कि खुदा भी करीब लगता था,
अब तेरी खामोशी में खुद से भी फासला सा लगता है।

कभी तेरे लबों पर मेरे लिए दुआओं का समंदर बहता था,
अब उन्हीं लबों पर मेरे लिए कोई अफसाना भी नहीं बचता है।

ये जो दिल में एक अजीब सी तड़प बाकी है,
ये तेरी अधूरी चाहत की आखिरी निशानी बाकी है।

हमने तो हर लम्हा तेरे ख्याल में इबादत की तरह गुजारा,
तूने हर लम्हे को बस एक किस्सा समझकर बिसरा दिया।

मोहब्बत में शिकवा करना तो हमने सीखा ही नहीं,
बस तेरी खुशी के लिए खुद से ही किनारा कर लिया।

अब न तो रातों में वो चांदनी रहती है,
न तेरे बिना इन आंखों में वो नमी रहती है।

फिर भी इस दिल ने तुझसे कोई हिसाब नहीं मांगा,
बस तेरी याद को सीने में महफूज रखा है।

✍️ हेमंत सिंह कुशवाह

हेमंत सिंह कुशवाह

राज्य प्रभारी मध्यप्रदेश विकलांग बल मोबा. 9074481685

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