ग़ज़ल
साथ फलता नहीं है यकीं मानिए।
चोर सब ही बने हैं यकीं मानिए।।
बंगले का अभी क्या हाल हो गया।
भव्यता लुट रही है यकीं मानिए।।
झूठ देगा गवाही अभी सोचिए।
भ्रष्टता बढ़ रही है यकीं मानिए।।
देख अभियान चलते रहेंगे सदा।
नीतियाँ तो न बदलें यकीं मानिए।।
झूठ सच ही बने भाग्य की बात है।
झूठ फाँसी चढ़ेगा यकीं मानिए।।
मुफ़लिसी में मरें भूख पाले हुए।
है न कोई सहारा यकीं मानिए।।
सत्य बैठा हुआ आज सज-धज सुनो।
सत्य की जीत होगी यकीं मानिए।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
