विज्ञान

क्वांटम युग में सुरक्षित संचार

कभी संचार की सुरक्षा का अर्थ मजबूत ताले, जटिल संकेत शब्द और अत्याधुनिक कूटलेखन तक सीमित था, लेकिन अब तकनीकी दुनिया उस मोड़ पर पहुँच रही है जहाँ सुरक्षा की परिभाषा ही बदलने वाली है। क्वांटम प्रौद्योगिकी ने प्रयोगशालाओं की सीमाओं से बाहर निकलकर वास्तविक संचार प्रणालियों में प्रवेश करना शुरू कर दिया है। भारत में हाल में 5.56 किलोमीटर लंबी मुक्त-अंतरिक्ष क्वांटम कुंजी वितरण प्रणाली का सफल प्रदर्शन इसी परिवर्तन का महत्वपूर्ण संकेत है। इस परीक्षण ने यह दिखाया है कि प्रकाश के क्वांटम गुणों का उपयोग करके दो अलग-अलग स्थानों के बीच अत्यंत सुरक्षित संचार की आधारभूत व्यवस्था विकसित की जा सकती है। यह उपलब्धि केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस भविष्य की तैयारी है जिसमें डिजिटल सूचना की सुरक्षा आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा का केंद्रीय प्रश्न बनने वाली है।

आज बैंकिंग से लेकर स्वास्थ्य, अंतरिक्ष, ऊर्जा, दूरसंचार और प्रशासन तक लगभग प्रत्येक महत्वपूर्ण व्यवस्था डिजिटल नेटवर्क पर निर्भर है। जितनी तेजी से डिजिटल निर्भरता बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से साइबर हमलों की जटिलता भी बढ़ रही है। वर्तमान कूटलेखन प्रणालियाँ शक्तिशाली हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा मुख्यतः इस धारणा पर टिकी है कि कुछ गणितीय समस्याओं को हल करना अत्यंत कठिन है। भविष्य के शक्तिशाली क्वांटम कंप्यूटर ऐसी कुछ समस्याओं को अपेक्षाकृत कम समय में हल करने की क्षमता विकसित कर सकते हैं। इसलिए आज सुरक्षित रखी जा रही संवेदनशील सूचनाओं को कल की तकनीक से सुरक्षित रखना एक गंभीर चुनौती है। क्वांटम संचार इसी चुनौती के लिए एक नई वैज्ञानिक दिशा प्रस्तुत करता है।

क्वांटम कुंजी वितरण का मूल विचार अत्यंत रोचक है। इसमें क्वांटम अवस्था का उपयोग करके दो पक्षों के बीच एक गुप्त कुंजी साझा की जाती है। क्वांटम अवस्था में हस्तक्षेप करने या उसे मापने का प्रयास उसके स्वरूप में परिवर्तन पैदा कर सकता है। इस परिवर्तन को संचार प्रणाली में छेड़छाड़ के संकेत के रूप में पहचाना जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि क्वांटम संचार अपने आप हर प्रकार के साइबर अपराध को समाप्त कर देगा। वास्तविक सुरक्षा के लिए उपकरणों, सॉफ्टवेयर, प्रमाणीकरण, नेटवर्क संरचना और मानव प्रक्रियाओं को भी मजबूत रखना होगा। फिर भी इसका महत्व इस बात में है कि सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण आधार प्रकृति के मूलभूत नियमों से प्राप्त होता है, केवल गणितीय कठिनाई से नहीं।

भारत का 5.56 किलोमीटर का मुक्त-अंतरिक्ष परीक्षण इसी दिशा में उल्लेखनीय कदम है। इसमें क्वांटम कुंजी वितरण को वास्तविक वातावरण में परखा गया, जहाँ प्रयोगशाला की नियंत्रित परिस्थितियों के बजाय प्रकाश को खुले वातावरण से होकर गुजरना पड़ा। ऐसे वातावरण में मौसम, धूल, वायुमंडलीय हलचल, कंपन और अत्यंत सटीक दिशानिर्धारण जैसी समस्याएँ सामने आती हैं। इसलिए प्रयोगशाला में किसी सिद्धांत को सिद्ध कर देना और उसे वास्तविक दूरी पर स्थिर संचार व्यवस्था में बदल देना दो अलग-अलग उपलब्धियाँ हैं। हालिया प्रदर्शन इस दूसरी दिशा में बढ़ती भारतीय क्षमता का संकेत देता है। परीक्षण में पाँच प्रतिशत से कम क्वांटम बिट त्रुटि दर के साथ सुरक्षित कुंजी निर्माण किया गया, जो व्यावहारिक प्रयोग की दृष्टि से महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

इस उपलब्धि का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत ने क्वांटम तकनीक को केवल एक प्रयोगात्मक विषय के रूप में नहीं देखा है। राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के लिए 6,003.65 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य क्वांटम संगणना, क्वांटम संचार, क्वांटम संवेदन और क्वांटम सामग्री जैसे क्षेत्रों में देश की स्वदेशी क्षमता विकसित करना है। दीर्घकाल में भारत लगभग 2,000 किलोमीटर तक सुरक्षित उपग्रह आधारित क्वांटम संचार और लंबी दूरी के क्वांटम कुंजी वितरण नेटवर्क जैसी क्षमताएँ विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसका अर्थ है कि आज का 5.56 किलोमीटर का प्रयोग किसी अंतिम उपलब्धि का नहीं, बल्कि एक बड़े राष्ट्रीय तकनीकी लक्ष्य की शुरुआती सीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है।

क्वांटम संचार का भविष्य केवल सुरक्षित संदेश भेजने तक सीमित नहीं है। अत्यधिक सटीक समय निर्धारण, उपग्रह आधारित प्रणालियाँ, नौवहन, वैज्ञानिक मापन, संवेदन तकनीक और भविष्य की संचार संरचनाएँ भी इससे प्रभावित हो सकती हैं। क्वांटम संवेदक अत्यंत सूक्ष्म परिवर्तनों को पहचानने में सक्षम हो सकते हैं। इससे भूगर्भीय अध्ययन, चिकित्सा अनुसंधान, अंतरिक्ष विज्ञान और औद्योगिक निगरानी जैसे क्षेत्रों में नए अवसर खुल सकते हैं। इसी कारण क्वांटम प्रौद्योगिकी को केवल साइबर सुरक्षा का उपकरण मानना इसके व्यापक प्रभाव को सीमित कर देना होगा। यह अगली पीढ़ी की वैज्ञानिक अवसंरचना का आधार बन सकती है।

हालाँकि इस क्षेत्र में भारत के सामने कई कठिनाइयाँ भी हैं। क्वांटम तकनीक अत्यधिक विशेषज्ञता मांगती है और इसके लिए भौतिकी, गणित, प्रकाशिकी, कंप्यूटर विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा साइबर सुरक्षा के बीच गहरा समन्वय आवश्यक है। भारत के विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में अलग-अलग विषयों के बीच सहयोग बढ़ाना होगा। केवल शोध-पत्र प्रकाशित करना पर्याप्त नहीं होगा; प्रयोगशाला से उद्योग तक तकनीक पहुँचाने की स्पष्ट व्यवस्था बनानी होगी। स्वदेशी उपकरण निर्माण, उच्च गुणवत्ता वाले प्रकाशीय घटक, क्वांटम सेंसर, नियंत्रक प्रणालियाँ और विश्वसनीय सॉफ्टवेयर विकसित करना भी उतना ही आवश्यक होगा। यदि इन क्षेत्रों में विदेशी निर्भरता बनी रही तो तकनीकी आत्मनिर्भरता अधूरी रह जाएगी।

मानव संसाधन इस पूरी यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। क्वांटम विज्ञान ऐसा क्षेत्र है जहाँ केवल पारंपरिक कंप्यूटर शिक्षा या सामान्य इंजीनियरिंग ज्ञान पर्याप्त नहीं होगा। विद्यार्थियों को गणितीय मॉडलिंग, क्वांटम भौतिकी, सूचना सिद्धांत, कूटलेखन और प्रोग्रामिंग का संयुक्त ज्ञान देना होगा। विश्वविद्यालयों में प्रयोगात्मक प्रशिक्षण बढ़ाना होगा और उद्योग को शोध संस्थानों के साथ मिलकर वास्तविक समस्याएँ उपलब्ध करानी होंगी। भारत के लिए यह अवसर भी है कि वह बड़ी युवा आबादी को भविष्य की अत्याधुनिक तकनीक के लिए तैयार करे। यदि समय रहते विशेषज्ञों का मजबूत आधार तैयार हो गया तो क्वांटम क्षेत्र रोजगार और नवाचार का नया केंद्र भी बन सकता है।

इस तकनीक की सीमाओं को समझना भी उतना ही जरूरी है। क्वांटम कुंजी वितरण को साइबर सुरक्षा का अकेला समाधान मानना उचित नहीं होगा। किसी भी संचार नेटवर्क में कमजोर कड़ी केवल संचार माध्यम नहीं होती; अंतिम उपकरण, उपयोगकर्ता की पहचान, सॉफ्टवेयर और नेटवर्क प्रबंधन भी हमले का माध्यम बन सकते हैं। इसलिए भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था में क्वांटम कुंजी वितरण के साथ उत्तर-क्वांटम कूटलेखन, मजबूत प्रमाणीकरण, सुरक्षित हार्डवेयर और निरंतर निगरानी का संयोजन आवश्यक होगा। सुरक्षा की वास्तविक शक्ति किसी एक चमत्कारी तकनीक में नहीं, बल्कि बहुस्तरीय संरचना में होगी।

आम नागरिक के जीवन में इसका प्रभाव शायद तुरंत दिखाई न दे। मोबाइल फोन या सामान्य इंटरनेट उपयोगकर्ता को संभवतः यह पता भी न चले कि किसी बैंकिंग लेनदेन या सरकारी संचार के पीछे किस प्रकार की सुरक्षा तकनीक काम कर रही है। लेकिन यही अदृश्य अवसंरचना भविष्य में डिजिटल अर्थव्यवस्था की विश्वसनीयता तय करेगी। जिस तरह आज बिजली, दूरसंचार और इंटरनेट दिखाई न देने के बावजूद आधुनिक जीवन की आधारभूत आवश्यकता बन चुके हैं, उसी तरह क्वांटम सुरक्षा भी महत्वपूर्ण डिजिटल प्रणालियों की अदृश्य सुरक्षा परत बन सकती है।

भारत के सामने इसलिए केवल तकनीकी उपलब्धि दर्ज करने का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब प्रयोगशाला में विकसित तकनीक विश्वसनीय नेटवर्क, स्वदेशी उत्पाद, प्रशिक्षित विशेषज्ञ और बड़े पैमाने पर उपयोग होने वाली प्रणालियों में बदल सके। 5.56 किलोमीटर की उपलब्धि दूरी के लिहाज से अंतिम मंजिल नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से इसका संदेश बहुत दूर तक जाता है। डिजिटल युग की अगली प्रतिस्पर्धा केवल गति, भंडारण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नहीं होगी; वह विश्वास और सुरक्षा की भी होगी। जिस देश के पास अपने डिजिटल ढाँचे को भविष्य के खतरों से सुरक्षित रखने की क्षमता होगी, उसके पास आर्थिक स्थिरता, वैज्ञानिक आत्मविश्वास और रणनीतिक स्वतंत्रता की मजबूत नींव होगी। भारत का क्वांटम अभियान भविष्य की दस्तक है, जहाँ सुरक्षित संचार केवल सुविधा नहीं, बल्कि डिजिटल सभ्यता के अस्तित्व और विश्वास का आधार होगा।

— अवनीश कुमार गुप्ता

अवनीश कुमार गुप्ता

साहित्यकार, स्वतंत्र स्तंभकार, समीक्षक एवं पुस्तकालयाध्यक्ष पता: प्रयागराज 211008, उत्तर प्रदेश मोबाइल: 8354872602 ईमेल: awanishg30@gmail.com

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