हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – कबीरा खड़ा हाईवे पर

जैसे ही मैंने सुना कि बनारस हाईवे पर कबीरदास खड़े होकर दोहे सुना रहे है मैं चौका और तुरंत उस हाईवे की तरफ़ भागा। मैंने देखा एक आदमी ख़ुद को कबीर कह रहा है। मैंने कहा – भाई तुम अपने को कबीर क्यों कह रहे हो यह कबीरदास का अपमान है। मेरी बात सुनकर मेरे बाज़ू में खड़ा एक आदमी बोला – वह हर आदमी जो फक्कड़ है , कुरीतियों के ख़िलाफ़ बोलता है , जो सत्ता से नही डरता वह कबीर है। सुनो वह क्या कह रहा है – मैंने सुना तो वह कह रहा था –
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे नेता पूत।
भागे वोटर देख कर हो जैसे नेता भूत।।
मैंने कहा – भाई ये तुकबंदी बंद करो। यह तो कबीर का अपमान है उस महान कवि को इस तरह याद नही करना चाहिए। इससे अच्छा तो यह होगा कि उनकी मूल रचना का पाठ करो। मेरी बात को वह कहां सुन रहा था वह अपनी मस्ती में कहे जा रहा था –
दल बदल कर जो गया वो दलदल होय।
दो पार्टी के बीच में साबुत बचा न कोय।।
मैं उसका मुंह तो बंद नही कर सकता था इसलिये मैंने अपने कान बंद कर लिये। लेकिन कोई अपने कान बंद कर के कब तक खड़ा रह सकता है अतः कुछ समय बंद मैंने कान पर से अपने हाथ हटा लिये। जैसे ही कान पर से हाथ हटाया उस तथाकथित कबीर के शब्द मेरे को सुनाई दिये –
मंत्री अफ़सर दोनों खड़े काके लागू पाये।
बलिहारी गुरु आपनो मुझको दिया भगाये।।
उसको बोलता देख लोग जमा होने लगे और कहने लगे – बंदगी साहेब बंदगी। मैंने कहा इस तरह पैरोडी लेखन को प्रोत्साहित नही करना चाहिए। उससे कहो यदि योग्यता है तो कुछ मौलिक सुना। मेरी बात लोगों को बकवास लगने लगी। लोग बोले चुप रहो और तुम भी सुनो। उनका कबीर कह रहा था –
कोचिंग में पढी पढी जग मुआ पंडित भया न कोय।
ढ़ाई आखर हत्या का जो पढ़े वो चयनित होय ।।
मेरे से सुना नही जा रहा था। मैं मन ही मन प्रार्थना कर रहा था कि हे कबीर इन मूर्खो को क्षमा करना ये जानते नही कि ये क्या कर रहे है। तभी मेरे मन कान में सुनाई दिया –
क्रेडिट क्रेडिट सब करे – डेबिट करे न कोय।
डेबिट भी होता रहे – वेटिंग करे न कोय।।
जनता ने इसे कबीर घोषित कर दिया था। दरअसल आम आदमी को बहुत दिनों से एक कबीर की ज़रूरत महसूस हो रही थी। जब भेद – भाव , जात – पात , उंच – नीच चरम पर पहुच जाते हैं तब इनसे टकराने एक कबीर आता है। जिसने भी गलत को गलत कहा पीड़ित को वही कबीर लगने लगता है। मैंने अपना ध्यान उनके डुप्लीकेट कबीर की तरफ़ किया तो वह कह रहा था –
दुख में सुमिरन सब करे सुख में करे न कोय।
नेता चुनिये ढ़ंग का तो दुख काहे को होय।।
मैं करता क्या अपना सिर पीटने लगा। इसमें न रदीफ़ है न काफ़िया , लाईन में भी वज़न नही है बिंब की तो बात ही छोड़ो। वह बोले जा रहा था श्रोता सुन कर ताली बजा रहे थे , वाह वाह कर रहे थे नतीजे में अकवि कवि का रूप ले रहा था। आज साहित्य के हाईवे पर अकवि सरपट भाग रहे हैं जो कवि हैं प्रेम गली अति सांकरी कहते कहते सकरी गली में ही सिमट गये हैं। तभी उस फ़कीर के शब्दों से मेरा ध्यान टूटा सुना तो वह कह रहा था –
भ्रष्ट गली विस्तरित सेट सभी की ट्यून
अफ़सर बाबू ड्राईवर एवं मिस्टर प्यून।।
जैसे जैसे लोग ताली बजा रहे थे उसका जोश बढ़ता जा रहा था। ताली का तर्कशास्त्र सब का दिमाग ख़राब कर देता है। कवि सम्मलेन और मुशायरों में मूर्ख ज़्यादा वाह वाह करते हैं। इधर वालों की ताली पर उधर वाला और उत्साह से कहने लगा –
ज्ञान न पूछो आदमी का पूछो केवल जात।
अपनों को गले लगाओ वरना मारो लात।।
तभी वहां बड़ी सी कार में दो सेठ आये और वहाँ अपना माल बेचने लगे। उन्होंने एक गिफ्ट पैकेट अकवि के चरणों में रखा। प्रसन्न होकर उनके कबीर ने दो पंक्ति उन्हें समर्पित करते हुए कहा –
साईं इतना दीजिये दस दस पीढ़ी खाये।
हम तो खाये ठूस ठूस , साधू भूखा जाये।।
अब मेरा वहां एक मिनट भी खड़ा रहना मुश्किल हो रहा था। मैं वहां से भागा। जाते जाते मेरे कान में डी माँडल के कबीर के ये शब्द सुनाई दिये –
कबीरा खड़ा हाईवे पर मांगे सब की खैर
न खाकी संग दोस्ती न खादी संग बैर।।

— अख़तर अली

अखतर अली

जन्म 14 अप्रेल 1960, रायपुर (छत्तीसगढ़) मूलतः व्यंग्यकार, विगत 40 वर्षो से निरंतर लेखन जारी। व्यंग्य, समीक्षा, आलेख एवं लघु कथाओं का निरंतर लेखन। अमृत संदेश, नव भारत, दैनिक भास्कर, नई दुनिया,रांची एक्सप्रेस, जनवाणी, हरिभूमि, राजस्थान पत्रिका,पंजाब केसरी, वागर्थ, बालहंस,सुखनवर, सामानांतरनामा, कलावासुधा, इप्टा वार्ता, सूत्रधार, कार्टून वाच, दुनियाँ इन दिनों उदंती.काँम, साहित्य सुधा, साहित्यकथा, रचनाकार, अट्टहास, विभोम स्वर, सदभावना दर्पण आदि आदि पत्रिकाओं में निरंतर रचनाये प्रकाशित। आज की जनधारा में व्यंग्य स्तंभ हबीब तनवीर से रंगमंच का प्रशिक्षण। अनेको नाट्य स्पर्धाओं में सम्मेलनों, गोष्ठियों में शिरकत। लिखित प्रमुख व्यंग्य नाटक – निकले थे मांगने किस्सा कल्पनापुरका विचित्रलोक की सत्यकथा नंगी सरकार अमंचित प्रस्तुति खुल्लम खुल्ला सुकरात अजब मदारी गजब तमाशा एक अजीब दास्ताँ दर्द अनोखे प्यार के नाक। प्रमुख नाट्य रूपांतरण – ईदगाह (मुंशी प्रेमचंद) किस्सा नागफनी (हरिशंकर परसाई) अकाल उत्सव (गिरीश पंकज) मौत की तलाश में (फ़िक्र तौसवी) टोपी शुक्ला (राही मासूम रज़ा) बाकी सब खैरियत है (सआदत हसन मंटो) असमंजस बाबू (सत्यजीत रे) जितने लब उतने अफसाने (राजी सेठ) एक गधे की आत्म कथा (कृष्ण चंदर) बियालिस साल आठ महीने (सआदत हसन मंटो) सात दिन तुमने क्यों कहा था कि मै खूबसूरत हूं (यशपाल) काली शलवार (एक पात्रीय) (मंटो) नाक (निकोलाई गोगोल) प्रमुख नुक्कड़ नाटक – नाटक की आड़ में, लाटरी लीला, खदान दान। सम्पर्क – अखतर अली,निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल, आमानाका, रायपुर। मो.न. 9826126781 Email – akhterspritwala@gmail.com

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