लघुकथा

आगे की राह आसान हो जाती है

असम के शिवसागर जिले के एक छोटे-से गाँव में नीलोत्पल नाम का एक युवक रहता था। उसके सपने बड़े थे, मगर परिस्थितियाँ हमेशा उसके हौसलों की परीक्षा लेती रहती थीं। पिता की छोटी-सी चाय की दुकान थी और घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह अपनी इच्छाओं को आसानी से पूरा कर सके।

नीलोत्पल अक्सर ब्रह्मपुत्र के किनारे बैठकर दूर तक बहते पानी को देखा करता था। उसे लगता था कि नदी की तरह जीवन भी कभी शांत तो कभी अशांत रहता है। लेकिन नदी अपना रास्ता बनाना नहीं छोड़ती। एक दिन उसने गुवाहाटी जाकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने का निर्णय लिया। परिवार ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसकी मदद की। माँ ने जाते समय बस इतना कहा, “बेटा, रास्ते में कितनी भी मुश्किलें आएँ, अपने इरादों को कमजोर मत होने देना।”

शुरुआत में सब कुछ अच्छा रहा, लेकिन कुछ महीनों बाद आर्थिक तंगी, असफलता और अकेलेपन ने उसे भीतर तक तोड़ना शुरू कर दिया। पहली परीक्षा में वह असफल हुआ, दूसरी में भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिला। उसके कुछ मित्रों ने सलाह दी कि वह अपने गाँव लौट जाए और कोई छोटा-मोटा काम शुरू कर दे।

एक शाम निराश होकर वह अपने कमरे में बैठा था। तभी गाँव से उसके पिता का फोन आया। पिता ने बताया कि दुकान पर आने वाला एक बुजुर्ग ग्राहक रोज कहा करता है कि चाय की छोटी-सी दुकान भी किसी बड़े सपने की शुरुआत हो सकती है, बशर्ते आदमी मेहनत करना न छोड़े।

पिता की यह बात उसके दिल में उतर गई। अगली सुबह उसने अपनी असफलताओं का हिसाब लगाने के बजाय अपनी कमियों को सुधारने का संकल्प लिया। उसने समय का बेहतर उपयोग किया, नियमित अध्ययन शुरू किया और हर असफलता को एक नया सबक मानकर आगे बढ़ता रहा।

एक वर्ष बाद परिणाम आया। इस बार नीलोत्पल सफल हो चुका था। उसकी आँखों में खुशी के आँसू थे। उसने सबसे पहले माँ को फोन किया। माँ कुछ क्षण खामोश रही, फिर बोली, “देखा बेटा, रास्ते कभी अपने आप आसान नहीं होते, उन्हें हमारी मेहनत आसान बनाती है।”

कुछ दिनों बाद नीलोत्पल गाँव लौटा। ब्रह्मपुत्र के उसी किनारे बैठकर उसने बहती नदी को देखा। अब उसे समझ आ चुका था कि जीवन में मंजिल तक पहुँचने से अधिक महत्त्वपूर्ण है, रास्ते में स्वयं को बेहतर बनाते रहना। उसने मन ही मन कहा—जब इंसान अपने भीतर के भय को परास्त कर लेता है, परिस्थितियों से समझौता करने के बजाय उनका सामना करता है और निरंतर कर्म करता रहता है, तब आगे की राह धीरे-धीरे आसान होती जाती है।

जीवन का सार यही है कि कठिन रास्ते हमारी परीक्षा लेने नहीं, बल्कि हमारी क्षमता को पहचानने का अवसर देने आते हैं। मंजिल उन्हीं को मिलती है, जो ठोकरों के बावजूद चलना नहीं छोड़ते।

— डॉ. अशोक, पटना

डॉ. अशोक कुमार शर्मा

पिता: स्व ० यू ०आर० शर्मा माता: स्व ० सहोदर देवी जन्म तिथि: ०७.०५.१९६० जन्मस्थान: जमशेदपुर शिक्षा: पीएचडी सम्प्रति: सेवानिवृत्त पदाधिकारी प्रकाशित कृतियां: क्षितिज - लघुकथा संग्रह, गुलदस्ता - लघुकथा संग्रह, गुलमोहर - लघुकथा संग्रह, शेफालिका - लघुकथा संग्रह, रजनीगंधा - लघुकथा संग्रह कालमेघ - लघुकथा संग्रह कुमुदिनी - लघुकथा संग्रह [ अन्तिम चरण में ] पक्षियों की एकता की शक्ति - बाल कहानी, चिंटू लोमड़ी की चालाकी - बाल कहानी, रियान कौआ की झूठी चाल - बाल कहानी, खरगोश की बुद्धिमत्ता ने शेर को सीख दी , बाल लघुकथाएं, सम्मान और पुरस्कार: काव्य गौरव सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, कविवर गोपाल सिंह नेपाली काव्य शिरोमणि अवार्ड, पत्राचार सम्पूर्ण: ४०१, ओम् निलय एपार्टमेंट, खेतान लेन, वेस्ट बोरिंग केनाल रोड, पटना -८००००१, बिहार। दूरभाष: ०६१२-२५५७३४७ ९००६२३८७७७ ईमेल - ashokelection2015@gmail.com

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