एक दीप मन के नाम
विधा- कविता
शीर्षक- एक दीप मन के नाम
दिवाली पर हम रोशन करते हैं
अपने घरों को,
लगाते हैं बालकनी में
झालरों को,
बंदनवारों को,
सजाते हैं रंगोली से
अपने आँगन को,
बाँटते हैं खुशियाँ
अपनों के बीच,
क्या हमने अपने मन के लिए,
कोई दीप जलाया?
मन के भीतर छिपे
अँधेरों को मिटाया?
इस बार क्यों न एक दीप
अपने मन के नाम भी जलाएँ,
जो
मन के भीतर छिपे
अँधेरों को मिटाए,
बीती बातों की
कड़वाहट को दूर करे,
रिश्तों में प्रेम, विश्वास
और अपनापन जगाए,
दूसरों के जीवन में
उजाला करने के लिए
सबसे पहले अपने भीतर
रोशनी होना ज़रूरी है।
इस दिवाली
एक दीप उम्मीद का,
एक दीप क्षमा का,
एक दीप संवेदना का
एक दीप उन सपनों के नाम,
जिन्हें हमने कहीं पीछे छोड़ दिया है।
केवल घर ही नहीं,
अपने मन को भी रोशन करें
क्योंकि
भीतर का अँधेरा मिटना
और मन प्रेम के प्रकाश से भर उठना ही
असली दिवाली होती है।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
