सामाजिक

पद पाने के लिए समाजसेवा का बढ़ता ड्रामा

समाजसेवा कभी निस्वार्थ भाव से समाज के दुख-दर्द बांटने, जरूरतमंदों की मदद करने और सामाजिक बदलाव लाने का माध्यम हुआ करती थी। लेकिन बदलते दौर में समाजसेवा की परिभाषा भी कहीं-कहीं बदलती दिखाई दे रही है। अब सेवा से ज्यादा उसका प्रचार, जरूरतमंदों की मदद से ज्यादा कैमरों की मौजूदगी और सामाजिक जिम्मेदारी से ज्यादा पद-प्रतिष्ठा हासिल करने की लालसा नजर आने लगी है। सवाल यह है कि क्या समाजसेवा वास्तव में समाज के लिए हो रही है या समाजसेवा के नाम पर अपने राजनीतिक और व्यक्तिगत हित साधने का नया रास्ता तैयार किया जा रहा है?

आजकल सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में एक नया चलन तेजी से देखने को मिल रहा है। जैसे ही किसी संस्था, संगठन, पंचायत, राजनीतिक दल या सामाजिक मंच पर कोई पद खाली होने की चर्चा शुरू होती है, वैसे ही कुछ लोगों की समाजसेवा अचानक तेज हो जाती है। जो लोग लंबे समय तक समाज की समस्याओं, गरीबों की परेशानियों और जरूरतमंदों की मजबूरियों से अनजान बने रहते हैं, वे अचानक सेवा के बड़े-बड़े दावे करने लगते हैं। कहीं कंबल वितरण का कार्यक्रम आयोजित होता है, कहीं राशन बांटने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की जाती हैं, तो कहीं किसी जरूरतमंद परिवार की सहायता करते हुए दर्जनों फोटो खिंचवाए जाते हैं।

यहां सवाल किसी के सेवा कार्य पर उंगली उठाने का नहीं, बल्कि सेवा के पीछे छिपी नीयत और उद्देश्य को समझने का है। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में जरूरतमंदों की सहायता कर रहा है तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन जब सेवा का मुख्य उद्देश्य किसी पद को हासिल करना, अपनी छवि चमकाना या भविष्य में राजनीतिक लाभ उठाना बन जाए, तब उस प्रवृत्ति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

समाजसेवा और दिखावे के बीच एक बहुत बारीक लेकिन महत्वपूर्ण अंतर होता है। सच्चा समाजसेवी बिना किसी प्रचार के भी लोगों के दुख-दर्द में शामिल होता है। उसे न तो हर सहायता के बाद फोटो की जरूरत होती है और न ही हर अच्छे काम के बदले सम्मान-पत्र या पद की अपेक्षा। इसके विपरीत, दिखावे की सेवा में अक्सर काम से ज्यादा प्रचार पर ध्यान दिया जाता है। जरूरतमंद व्यक्ति की परेशानी से अधिक महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि कार्यक्रम में कितने लोग आए, कितनी तस्वीरें खिंचीं और सोशल मीडिया पर कितनी प्रतिक्रियाएं मिलीं।

आज सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया है। सेवा कार्यों की जानकारी लोगों तक पहुंचाना गलत नहीं है। कई बार प्रचार से दूसरे लोग भी प्रेरित होते हैं और सामाजिक कार्यों के लिए सहयोग मिलता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी जरूरतमंद की मजबूरी को प्रचार का साधन बना दिया जाता है। उसकी गरीबी, बेबसी और आत्मसम्मान को कैमरे के सामने प्रदर्शित किया जाता है। मदद पाने वाला व्यक्ति कई बार अपनी परिस्थितियों के कारण कुछ कह भी नहीं पाता, जबकि मदद करने वाला अपनी उदारता का प्रचार करने में पीछे नहीं रहता। क्या किसी गरीब की मदद करते समय उसके सम्मान और निजता का ध्यान रखना हमारी जिम्मेदारी नहीं है?

एक और चिंताजनक पहलू यह है कि समाजसेवा के नाम पर पदों की दौड़ बढ़ती जा रही है। किसी सामाजिक संस्था का अध्यक्ष बनना हो, किसी संगठन में जिम्मेदारी हासिल करनी हो या किसी राजनीतिक मंच पर पहचान बनानी हो, इसके लिए सेवा गतिविधियों को उपलब्धियों की सूची की तरह प्रस्तुत किया जाने लगा है। कई बार वर्षों से समाज के लिए काम कर रहे ईमानदार और समर्पित लोगों को पीछे छोड़कर वे लोग आगे आ जाते हैं, जिनकी सक्रियता किसी पद की संभावना दिखाई देने के बाद ही शुरू हुई होती है।

इससे वास्तविक समाजसेवियों का मनोबल भी प्रभावित होता है। जो लोग बिना किसी स्वार्थ के वर्षों से सामाजिक कार्यों में लगे हैं, उन्हें यह देखकर निराशा होती है कि उनके अनुभव, समर्पण और योगदान की तुलना में प्रचार और व्यक्तिगत संपर्कों को अधिक महत्व दिया जा रहा है। सामाजिक संस्थाओं का उद्देश्य समाज के हित में काम करना होना चाहिए, न कि कुछ लोगों के व्यक्तिगत प्रभाव और प्रतिष्ठा को बढ़ाना।

समाज को यह समझना होगा कि पद किसी व्यक्ति की योग्यता का अंतिम प्रमाण नहीं होता। किसी संस्था का अध्यक्ष, प्रधान, पदाधिकारी या प्रतिनिधि बन जाने से कोई व्यक्ति अपने आप समाजसेवी नहीं बन जाता। असली पहचान उसके काम, व्यवहार, ईमानदारी और कठिन परिस्थितियों में निभाई गई जिम्मेदारी से बनती है। पद मिलने के बाद समाज को भूल जाना और पद पाने से पहले समाज के नाम पर बड़े-बड़े दावे करना किसी भी स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।

यह भी जरूरी है कि हम सभी को एक ही नजर से न देखें। आज भी अनेक ऐसे लोग हैं जो वर्षों से शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्तदान, पर्यावरण संरक्षण, गरीब परिवारों की सहायता और सामाजिक सुधार के कार्यों में निस्वार्थ भाव से लगे हुए हैं। वे किसी पद की अपेक्षा नहीं रखते और न ही हर काम का हिसाब प्रचार के माध्यम से देते हैं। ऐसे लोगों का सम्मान होना चाहिए। उनकी पहचान उनके कार्यों से होती है, न कि उनके बैनरों और पोस्टरों से।

सवाल यह भी है कि समाज ऐसे दिखावे को बढ़ावा क्यों देता है? कई बार हम भी किसी व्यक्ति के वास्तविक योगदान को जाने बिना उसकी सोशल मीडिया पोस्ट, बड़े आयोजनों और चमकदार तस्वीरों से प्रभावित हो जाते हैं। सम्मान-पत्र बांटने और लेने की परंपरा ने भी कई जगह वास्तविक कार्यों की जगह औपचारिकताओं को महत्व देना शुरू कर दिया है। यदि समाज को बेहतर नेतृत्व चाहिए तो उसे लोगों की लोकप्रियता के बजाय उनके काम का मूल्यांकन करना होगा।

सामाजिक संस्थाओं और संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वे पदों का चयन करते समय पारदर्शिता और निष्पक्षता अपनाएं। पदाधिकारी चुनने का आधार केवल आर्थिक ताकत, राजनीतिक पहुंच, भीड़ जुटाने की क्षमता या प्रचार नहीं होना चाहिए। यह देखा जाना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति ने समाज के लिए कितना समय दिया है, कितनी समस्याओं का समाधान किया है और क्या वह जिम्मेदारी मिलने के बाद भी उसी निष्ठा से काम करेगा?

समाजसेवा को राजनीति से पूरी तरह अलग रखना संभव नहीं है, क्योंकि जनहित के अनेक कार्यों में राजनीतिक और प्रशासनिक सहयोग की आवश्यकता होती है। राजनीति में आने या पद प्राप्त करने की इच्छा रखना भी अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन सेवा को केवल सत्ता और प्रतिष्ठा तक पहुंचने की सीढ़ी बना देना निश्चित रूप से गलत है। यदि किसी व्यक्ति की राजनीति में आने की इच्छा है तो उसे खुलकर अपनी महत्वाकांक्षा स्वीकार करनी चाहिए, न कि समाजसेवा की आड़ में व्यक्तिगत स्वार्थ छिपाना चाहिए।

आज जरूरत इस बात की है कि समाज फोटो और भाषण से आगे बढ़कर परिणामों को देखे। किसी ने कितने कंबल बांटे, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कितने जरूरतमंदों तक वास्तविक सहायता पहुंची। कितने कार्यक्रम आयोजित किए, इससे ज्यादा जरूरी यह है कि कितनी समस्याओं का स्थायी समाधान हुआ। कितने सम्मान प्राप्त किए, इससे अधिक मायने रखता है कि कितने लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया।

अंततः समाजसेवा कोई मौसमी गतिविधि नहीं, बल्कि निरंतर निभाई जाने वाली जिम्मेदारी है। यह चुनाव, पद, सम्मान या किसी विशेष अवसर की मोहताज नहीं होती। असली समाजसेवक वह है जो बिना किसी पद के भी समाज के साथ खड़ा रहे और पद मिलने के बाद भी अपनी जिम्मेदारी न भूले।

समाज को अब यह तय करना होगा कि उसे पद पाने के लिए समाजसेवा का नाटक करने वाले चेहरे चाहिए या समाज के लिए अपना समय, श्रम और ईमानदारी समर्पित करने वाले लोग।

क्योंकि इतिहास में पहचान उन लोगों की नहीं बनी जिन्होंने सेवा के नाम पर सबसे ज्यादा तस्वीरें खिंचवाईं, बल्कि उन लोगों की बनी जिन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के लोगों के जीवन में बदलाव लाया। याद रखना चाहिए कि पद की कुर्सी कुछ समय के लिए मिल सकती है, लेकिन जनता के दिलों में जगह केवल सच्चे कर्मों से ही बनती है।

समाजसेवा को पद पाने का हथियार नहीं, समाज का दर्द समझने का संस्कार बनाइए। आखिर सेवा का असली सम्मान माला, मंच और तालियों में नहीं, बल्कि उस दुआ में है जो किसी जरूरतमंद के दिल से निकलती है।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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