कविता

वर्ण पिरामिड

रे
बंसी
बजाई
हरजाई
सगरी सुध
बिसराई झट-
पट गोपिन आई
*************
वो
तेरी
छुअन
मोहे मन
प्रेम अगन
जगे है सजन
आओ मधुसूदन
*************
रे
मन
पगले
परदेसी
दूर बसे है ।
तड़पत यूं है ।
जल बिन मछली

— चंद्रकांता सिवाल

 

चन्द्रकान्ता सिवाल 'चंद्रेश'

जन्म तिथि : 15 जून 1970 नई दिल्ली शिक्षा : जीवन की कविता ही शिक्षा हैं कार्यक्षेत्र : ग्रहणी प्ररेणास्रोत : मेरी माँ स्व. गौरा देवी सिवाल साहित्यिक यात्रा : विभिन्न स्थानीय एवम् राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित कुछ प्रकाशित कवितायें * माँ फुलों में * मैली उजली धुप * मैट्रो की सीढ़ियां * गागर में सागर * जेठ की दोपहरी प्रकाशन : सांझासंग्रह *सहोदरी सोपान * भाग -1 भाषा सहोदरी हिंदी सांझासंग्रह *कविता अनवरत * भाग -3 अयन प्रकाशन सम्प्राप्ति : भाषा सहोदरी हिंदी * सहोदरी साहित्य सम्मान से सम्मानित

One thought on “वर्ण पिरामिड

  • वर्ण पिरामिड बहुत पसंद आई और समझने में भी कोई दिकत नहीं आईं .

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