कविता : आखिरी उम्मीद
तुझसे प्यार की उम्मीद करती हूँ
तभी तो मैं तुझसे नाराज़ होती हूँ
तू आएगा मुझे मनाने ये जानती हूँ
तभी तो तेरे इन्तज़ार में रहती हूँ
तेरे आने के पल की गिनती करती हूँ
तेरी आहट हो कही यही अब सुनती हूँ
दरवाज़े पर खड़ी हो तेरी राह जोहती हूँ
तेरे आने की आस में हरदम जगती हूँ
एक़बार तो आजा आख़री साँसे गिनती हूँ
तेरे दीदार की प्यास में हरपल मुस्काती हूँ
— सुवर्णा परतानी
