कविता

रेगिस्तान…

मुमकिन है यह उम्र
रेगिस्तान में ही चुक जाए
कोई न मिले उस जैसा
जो मेरी हथेलियों पर
चमकते सितारों वाला
आसमान उतार दे!

यह भी मुमकिन है
एक और रेगिस्तान
सदियों-सदियों से
बाँह पसारे मेरे लिए बैठा हो
जिसकी हठीली ज़मीन पर
मैं खुशबू के ढाई बोल उगा दूँ!

कुछ भी हो सकता है
अनदेखा अनचाहा
अनकहा अनसुना
या यह भी कि तमाम ज़माने के सामने
धड़धड़ाता हुआ कँटीला मौसम आए
और मेरे पेशानी से लिपट जाए!

यह भी तो मुमकिन है
मैं रेगिस्तान से याराना कर लूँ
शबो सहर उसके नाम गुनगुनाऊँ
साथ जीने मरने की कस्में खाऊँ
और एक दूसरे के माथे पर
अपने लहू से ज़िन्दगी लिख दूँ!

जेन्नी शबनम (18. 3. 2017)