“बैरी से हो जंग”
भाव-सार के बिन नहीं, होता हृदय विभोर।
थोड़े दोहाकार है, ज्यादा दोहाखोर।।
—
मन में मैल भरा हुआ, होठों पर मुसकान।
फतवे जारी कर रहे, बिना पढ़े कुरआन।।
—
पूजा और अजान की, लगी हुई है होड़।
सम्बन्धों के दूध में, निम्बू रहे निचोड़।।
—
हमले चारों ओर से, होते ताबड़-तोड़।
फिर भी आतुर हो रहे, करने को गठजोड़।।
—
निभा सके जो आन से, किये हुए अनुबन्ध।
उससे रखने चाहिए, जीवन में सम्बन्ध।
—
साम-दाम तो याद है, भूल गये हैं दण्ड।
इसीलिए बैरी हुआ, सीमा पर उदण्ड।।
—
बाहों में मत पालिए, काले कुटिल भुजंग।
जन-मानस अब चाहता, बैरी से हो जंग।।
—
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
