कुण्डली/छंद कुंडलिया *महातम मिश्र 07/06/201808/06/2018 पलड़ा जब समतल हुआ, न्याय तराजू तोल पहले अपने आप को, फिर दूजे को बोल फिर दूजे को बोल, खोल रे बंद किवाड़ी उछल न जाए देख, छुपी है चतुर बिलाड़ी कह गौतम कविराय, झपट्टा मारे तगड़ा कर लो मनन विचार, झुके न न्याय का पलड़ा॥ — महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी