ग़ज़ल
अब कब बरस रही है हम इन्तज़ार करते
काली घटा घिरी है हम इन्तज़ार करते
इक प्यार की ख़ुशी बिन कोई ख़ुशी नहीं है
कब पास हर ख़ुशी है हम इन्तज़ार करते
हम मानते कि इक दिन सब ठीक-ठाक होगा
पर व्यग्र ज़िंदगी है हम इन्तज़ार करते
दिल आदिकाल से ही दुनिया पटा रहा है
इक्कीसवीं सदी है हम इन्तज़ार करते
हो धूप कुछ नरम तो हमदम पहुँच रहे हैं
अब रात हो चली है हम इन्तज़ार करते
अन्याय इस जहां में लम्बा कभी न चलता
जग से समय बली है हम इन्तज़ार करते
दीदार हुस्नगर का हमको अभी हुआ है
अरमां किया अभी है हम इन्तज़ार करते
— केशव शरण
