लघुकथा – रीढ़
ऑफिस की लिफ्ट खराब थी। 8वीं मंजिल। बॉस ने सुबह ही कह दिया था – “रिपोर्ट आज चाहिए, नहीं तो नौकरी गई समझो।” अजय की कमर में 3 साल से दर्द था। डॉक्टर ने कहा था “भारी काम मत करना, झुको मत।” घर पर मां का इलाज चल रहा था। EMI बाकी थी।
उसने फाइलों का बंडल उठाया। एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए सांस फूल रही थी। हर मोड़ पर कमर “मत कर” बोल रही थी। 7वीं मंजिल पर पैर लड़खड़ाए। फाइलें गिर गईं।
साइड में बैठा सिक्योरिटी गार्ड दादा बोला “बेटा छोड़ दे। कल दे देना।”
अजय ने फाइलें समेटीं। पसीना पोंछा। और धीरे से बोला “दादा, कमर का दर्द दवा से ठीक हो जाएगा। पर अगर आज झुक गया तो रीढ़ का दर्द जिंदगी भर रहेगा।”
आखिरी सीढ़ी पर पहुंचकर उसने रिपोर्ट बॉस की टेबल पर रखी। बॉस ने बिना देखे साइन किया और कहा “शाबाश।”
शाम को घर आकर अजय आईने के सामने खड़ा हुआ। कमर में पट्टी बंधी थी। पर पीठ एकदम सीधी। मां ने पूछा “बेटा थक गया?”
अजय मुस्कुराया “नहीं मां। आज पहली बार लगा कि मैं सीधा खड़ा हूं।” क्योंकि कुछ बोझ कंधों से नहीं, रीढ़ से उठाए जाते हैं।
— विकास कुमार शर्मा
