कुछ गीत हमारे मन के हों
कुछ श्वाँसों की सरगम के हों, कुछ सीने की धड़कन के हों।
कुछ गीत तुम्हारे मन के हों, कुछ गीत हमारे मन के हों।।
कुछ अश्रु जिन्हें इन पलको के, तटबंध सम्हाल नही पाए।
अन्तर्मन के कुछ भाव जिन्हें, शब्दों में ढाल नही पाए।।
कुछ में पतझर की पीड़ाएं, कुछ गीत सरस सावन के हों
कुछ गीत तुम्हारे मन के हों, कुछ गीत हमारे मन के हों
कुछ बंध प्रणय की पाती से, कुछ बंध लजाई अखियों से।
कुछ बंध हमारे यारों से, कुछ बंध तुम्हारी सखियों से।।
कुछ गीत प्रणिल भुजपाशों कर, कुछ पायल की खनखन के हों
कुछ गीत तुम्हारे मन के हों, कुछ गीत हमारे मन के हों
कुछ राग मचलती ख़्वाहिश के, कुछ व्यवहारिक मजबूरी के।
कु़छ आलौकिक अलिंगन के, कुछ तन की भौतिक दूरी के।।
कुछ गीतों में दुनियादारी, कुछ केवल अपनेपन के हों
कुछ गीत तुम्हारे मन के हों, कुछ गीत हमारे मन के हों
कुछ भाव हीन मुद्राओं के , कुछ हँसने के कुछ रोने के।
कुछ अर्पण और समर्पण के, कुछ पाने के कुछ खोने के।।
कुछ गीत काल्पनिकताओं के, कुछ गीत असल जीवन के हों
कुछ गीत तुम्हारे मन के हों, कुछ गीत हमारे मन के हों
— सतीश बंसल
