कविता

सवाल

सवाल को……

सवालों के कटघरे में खड़ा कर,

लोग खुद एक सवाल बन जाते हैं|

सवाल पे उटपटाँग सवाल कर,

बुद्धिजीवी बेमिसाल बन जाते हैं|

हर शख्स यहाँ सवाल करता है,

शिकायतों की पेटी में सुझावों को

बेमतलब, बेशुमार भरता है|

किसे पड़ी? कौन यहाँ….

जवाबों की तलाश करता है|

तोहमतों से ही तो इनके

सजी है ये पूरी महफ़िल,

गड़े मुर्दों को उखाड़कर

दुर्गुणों का अथक बखान करते

हर दिन इनका तमाम होता है|

अलग-अलग पैमानों पे रख

सवाल की ऐसी भद्द उड़ाते हैं,

देख के इनकी चिल्लम-पो

जवाब की जिज्ञासा लिए…बेचारे!

सवाल का कत्ले-ए-आम होता है|

— अनिता तोमर ‘अनुपमा’ 

अनिता तोमर ‘अनुपमा’

बेंगलुरु शिक्षा - एम. ए.(हिंदी) गोल्ड मेडलिस्ट, बी.एड संप्रति – शिक्षिका प्रकाशित पुस्तकें – साहित्यांकुर, बज़्म-ए-हिन्द (सांझा संग्रह), भावांजलि (तृतीय), विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित| सरिता साहित्य पुरस्कार योजना के अंतर्गत दो रचनाएँ प्रथम पुरस्कार द्वारा पुरस्कृत|