सवाल
सवाल को……
सवालों के कटघरे में खड़ा कर,
लोग खुद एक सवाल बन जाते हैं|
सवाल पे उटपटाँग सवाल कर,
बुद्धिजीवी बेमिसाल बन जाते हैं|
हर शख्स यहाँ सवाल करता है,
शिकायतों की पेटी में सुझावों को
बेमतलब, बेशुमार भरता है|
किसे पड़ी? कौन यहाँ….
जवाबों की तलाश करता है|
तोहमतों से ही तो इनके
सजी है ये पूरी महफ़िल,
गड़े मुर्दों को उखाड़कर
दुर्गुणों का अथक बखान करते
हर दिन इनका तमाम होता है|
अलग-अलग पैमानों पे रख
सवाल की ऐसी भद्द उड़ाते हैं,
देख के इनकी चिल्लम-पो
जवाब की जिज्ञासा लिए…बेचारे!
सवाल का कत्ले-ए-आम होता है|
— अनिता तोमर ‘अनुपमा’
