कविता

अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया
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हर साल आती है अक्षय तृतीया
इस साल भी अाई है
आगे भी आती रहेगी
हर सालों की तरह इस साल पर वो बात नहीं
सब काल का फेर है
अख़बारों के पन्नों से गायब है प्रचार
जो पुकारते थे बहुत शुभ दिन है
यह आज स्वर्ण को लेने का
नगर में लगे शोरूमों के जगमगाते इश्तहार भी
हुए गायब जैसे गधों के सिर से सींग
शोरूमों की रोनकें जिनमें महिलाओं की भीड़
गहनों के लिए दीवानगी सब गायब
शादियों के लिए बहुत शुभ मूहर्त
बिना मूहर्त के घोड़ी पर बैठने का मौका
पर न दिखता कोई घोड़ा न उसपर बिराजवन दुलहा
न बाराती न बग्घी न बैंड न सजावट
लगता नहीं कि आज वहीं तृतीया है
जिसमें सब काम शुभ ही शुभ हैं
यह काल का सब चक्र है
हम हैं उसके हाथ की कठपुतलियां

ब्रजेश

*ब्रजेश गुप्ता

मैं भारतीय स्टेट बैंक ,आगरा के प्रशासनिक कार्यालय से प्रबंधक के रूप में 2015 में रिटायर्ड हुआ हूं वर्तमान में पुष्पांजलि गार्डेनिया, सिकंदरा में रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा है कुछ माह से मैं अपने विचारों का संकलन कर रहा हूं M- 9917474020