ग़ज़ल
तेरी तस्वीर से बात की रातभर,
खुद में खोई रही खुद से हो बेख़बर।
मैं रहूँ न रहूँ , तुम रहो मुझमें ही
दिल ने चाहा तुम्हें टूटकर इस कदर।
शेष कुछ भी न चाहा तुम्हें चाहकर ,
चाहते चाहती चाह रहे उम्रभर।
दुःख के आँगन में जन्मी, पली औ बढ़ी,
आँसुओ से ही भीगी रही रात हर।
आज तक जिसको चाहा उसे खो दिया
कितना शापित मुकद्दर रहा बेसबर।
तुम मिले, जी उठी जिंदगी फ़िर मेरी,
जी गया फिर पुनः ढह चुका खंडहर।
आ नज़र से छिपा लूँ,नज़र में कही,
लग न पाये नज़र को नज़र की नज़र।
बात दिल की ही दिल में सदा रह गई
कितना बेबश रहा हर गूँगा अक्षर।
— सफलता सरोज
