लघुकथा

अनोखी रेस

 

रेस शुरू हो चुकी थी। खचाखच भरे स्टेडियम में लोग साँस रोककर इस अनोखे रेस को देख रहे थे।
दाल तेज दौड़ते हुए काफी आगे निकल चुकी थी कि तभी अचानक पेट्रोल और डीजल ने अपनी गति बढ़ा दी।
पेट्रोल डीजल को तेज दौड़ते देख सबसे आगे चल रहे रसोई गैस के सिलेंडर के कान खड़े हो गए। उसने भी अपनी गति बढ़ा दी। रसोई गैस का सिलेंडर अब भी सबसे आगे दौड़ रहा था।
पेट्रोल और डीजल दाल के करीब पहुँचकर खुदपर इतरा ही रहे थे कि तभी बगल से गुजरते सरसों के तेल की तेज गति देखकर हैरान रह गए। सबको पीछे छोड़ता हुआ सरसों का तेल अब डीजल पेट्रोल से बहुत आगे दौड़ रहा था।
हमेशा फिसड्डी रहनेवाला आलू भी अब काफी तेज दौड़ने लगा था हालाँकि रेस में अभी भी वह काफी पीछे था। उसकी सहचरी प्याजो रानी अलबत्ता इस दौड़ में उसका साथ निभा रही थी।
इस अफलातून दौड़ को देखकर सभी सब्जियाँ भी इस दौड़ में शामिल हो गईं। अब टमाटर भी भला कब तक चुप रहता ? दौड़ पड़ा वह भी इन सब्जियों के साथ ही रेस में और देखते ही देखते अपनी पूरी बिरादरी को पछाड़कर सबसे आगे लगभग सौ की स्पीड से दौड़ने लगा। तेज दौड़ते टमाटर की कनपटियाँ लाल सुर्ख हो गई थीं, लेकिन उसके चेहरे पर थकान का कोई नामोनिशान नहीं था।
मैदान में दौड़ रहे इन सभी धावकों में गजब की प्रतिस्पर्धा नजर आ रही थी। इनके अंदर गजब का उत्साह बना हुआ था लेकिन दिल थामकर यह दौड़ देख रही जनता अब बुरी तरह थक चुकी थी। थकान के मारे ये तमाशबीन एक एक कर स्टेडियम से बाहर निकलने लगे।
कुछ देर बाद धावकों की दौड़ जारी थी लेकिन स्टेडियम खाली हो चुका था। आयोजक अपने इस फैसले पर बैठे सिर धुन रहे थे।

 

*राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।