नया साल
गुलाबी सर्द हवाओं का प्यारा आलिंगन,
बीते कल की सुनहरी यादों में ले जाता है ,
दूर तलक फैली थी मोहक महक जिसकी,
पुरानी वादियों का अक्स महसूस कराता है ।
प्रकृति की रमणीक सुंदरता मन को भांति,
बर्फ की चादर ओढ़े धरती मुस्कुराती हैं,
अंगीठी से रात दिन एक धार होती सिकाई,
सवेरे दूर दूर तक धवल धुंध छा जाती हैं ।
फिर मद्धिम धूप का गुपचुप यूं खिलना,
कंपकंपाती ठिठुरन से राहत दे जाता है,
वो पुरवाई का हौले-हौले से मधुरतम स्पर्श,
तन-मन में नयी “आनंद” उमंग बढ़ाता हैं।
सर्द पौष-माघ की ये लंबी-लंबी ठंडी रातें,
यादों की गठरी ख़ुबसूरत बीती मुलाकातें हैं ।
कभी खत्म न होने वाली प्यारी अशेष बातें,
उम्र की दहलीज़ पर मिली बिछुड़ी सौगातें हैं ।
इसी बीच शुष्क दिसंबर को अलविदा कर,
नया साल नई योजनाओं के साथ आता हैं,
जीवन में कुछ पूरी और कुछ अधूरी रह गई,
चाहतों पर नव निर्माण नव प्रारूप सजाता हैं ।
— मोनिका डागा “आनंद”
