कविता

वैचारिक द्वंद्व

एक पुरुष है,वह पीता नही है
पर एक पिता है
दो बच्चे के
जिसे बिस्तर में छोड़ चली गयी थी
एक अभागी
शिशुओं के प्रेम के।
जिसके कारण एक लड़ाई जारी है
न्यायालय परिसर में
और दूसरी जारी है.. मन अभ्यतर में
यह द्वंद्व है….विचार के
भाषायी व्यवहार के
जिसमें रक्त रंजिश नही होती
गले भी नही दबते
फाँसी भी नही लटकते
विष पान भी नही होते
फिर भी व्यक्ति मर जाता है
टूटकर,अंतस से
घूँट-घूँट कर
किसी से कह नही पाता मन की बात
प्रात: दोपहर बेला ढल जाती है
बेचैनी में पूरी रात।।

— चन्द्रकांत खुंटे ‘क्रांति’

चन्द्रकांत खुंटे 'क्रांति'

जांजगीर-चाम्पा (छत्तीसगढ़)