गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल – क्या दे गया

जलती सहर सुलगती हुई रात दे गया,
बे दर्द एक शख़्स ये सौगात दे गया।

इस बार आगे बढ़कर सलाम उसने की,
हर बार की तरह वो मुझे मात दे गया।

आंसू , कराह , दिल की खटक,दर्द बे पनाह,
मुझको वो तरह, तरह के नग़मात दे गया।

देखा किसी ने मेरी तरफ़ इस निगाह से।
जैसे कोई किसी को खैरात दे गया।

अपना कोई नहीं हैं, मुखालिफ हैं हर तरफ़,
बिगड़ा हुआ नसीब ये हालत दे गया।

एहसान उसका मानेंगे हम सारी उमर भर,
जो खुशियों के चार, पांच लम्हात दे गया।

जलती सहर सुलगती हुई रात दे गया।
बे दर्द एक शख़्स ये सौगात दे गया।

— आसिया फारूकी

*आसिया फ़ारूक़ी

राज्य पुरस्कार प्राप्त शिक्षिका, प्रधानाध्यापिका, पी एस अस्ती, फतेहपुर उ.प्र