चातुर्मास – सनातनी विज्ञान
साधारणतया जब सन्त कहते हैं कि चातुर्मास अर्थात आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की ग्यारस तक प्रभु विष्णु योग निद्रा में चले गये, जिसका यह अर्थ कदापि नहीं कि वे सो गये हैं।इस तथ्य को समझने से पहले आप सभी के ध्याननार्थ एक चौपाई, जिसका गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में उल्लेख किया है –
“क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा, पञ्च तत्व रचि अधम शरीरा”
इसका अर्थ है : शरीर पाँच तत्वों (क्षिति – पृथ्वी, जल, पावक – अग्नि, गगन – आकाश, और समीरा – वायु) से बना है।
अब आगे बढ़ने से पहले निम्न लोकोक्ति, जो हमारे सनातन पञ्चाङ्ग वाले आषाढ़ माह से जुड़ी हुयी है, को ध्यान में रखना उचित रहेगा क्योंकि यह लोकोक्ति बारिश के पूर्वानुमान से सम्बन्धित है –
“वोरा आठौं भीगै कांकर, ग्यारस देव सोइये जाकर”
उपरोक्त लोकोक्ति स्पष्ट करती है कि आषाढ़ के उजाले पखवाड़े की अष्टमी (वोरा आठौं) को बारिश होने पर कांकर (छोटे पत्थर या कंकड़) भीग जाते हैं,और एकादशी [ग्यारस] को देव सो जाते हैं, जिसका अर्थ है मांगलिक कार्यो का स्थगन ।
अब वापस आते हैं चातुर्मास जिसे चौमासा भी कहते हैं वाले मसले पर। चूँकि बारिश का आगमन हो चुका है जिसके फलस्वरूप पाँचों तत्वों [ क्षिति – पृथ्वी, जल, पावक – अग्नि, गगन – आकाश, और समीरा – वायु ] के स्वभाव में बदलाव दिखने लगता है। अर्थात धरती पर अनेकों प्रकार की वनस्पतियाँ उग आती हैं साथ में जगह-जगह जल भर जाने से मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं।जिसके कारण विभिन्न प्रकार के रेंगने वाले जहरीले जीव, बिलों में पानी भर जाने से सतह पर आ जाते हैं।अग्नि मन्द पड़ जाती है। अधिकांश जल स्तोत्र दूषित हो जाते हैं तथा वायु में भी लगभग चालीस प्रतिशत पानी की मात्रा हो जाती है। आकाश में बादल छाये रहने के कारण धूप धरती तक नहीं पहुँच पाती है।
अतः ऐसे समय में किसी भी प्रकार के सामाजिक [विवाह आदि] अथवा मांगलिक कार्य करने में अनेक तरह के संकटों से सामना [रूबरू] होना स्वाभाविक है।इसके अलावा हमारा शरीर भी तो इन पाँच तत्वों से मिलकर ही बना है, इसलिये जो प्रभाव बाहर है वही हमारे शरीर के अन्दर भी होंगे अर्थात अगर बाहर मन्दाग्नि है तो हमारे शरीर की भी अग्नि (पाचन क्षमता) कमजोर पड़ जाती है।
इन सभी का ध्यान रख हमारे पूर्वजों ने देवशयनी ग्यारस से लेकर देवउठनी ग्यारस (शरद ऋतु) तक को चातुर्मास का रूप देकर, देवता विश्राम काल मानते हुए ,……..लम्बी यात्राओं, सामाजिक तथा विशेष मांगलिक कार्यक्रमों पर धार्मिक आवरण पहना कर रोक लगा दी ।
चूँकि हम सभी सनातनी शुरू से ही धर्मप्रधान समाज का हिस्सा रहे हैं अतः यह तथ्य हमने मन से स्वीकार कर लिया और अपने-अपने स्थान पर रहते हुए, अपने-अपने व्यावसायिक कर्म के साथ व्यक्तिगत धार्मिक उपासना को प्राथमिकता दी। गाँव-गाँव में, मन्दिरों-चौपालों पर सावन-भादौं माह में सामूहिक रूप से रामचरित मानस या अन्य धार्मिक ग्रन्थों का वाचन करते हैं।
उपरोक्त सभी का ध्यान रखते हुये आज भी यह आवश्यक है कि हम सभी अपने धर्म का पालन करें। इन सोये हुए देवताओं अर्थात पृथ्वी, जल, अग्नि,आकाश और वायु से सहयोग करें। जिसका मतलब यही है कि हम इन पँचतत्वों की रक्षा का, इस समय कोई न कोई संकल्प अवश्य लें। यही सनातनी विज्ञान है अर्थात हमारे सनातन में विज्ञान को भी, धर्म के आधार पर ही समझाया गया है। अतः , यह विज्ञान से जुड़ा हुआ तथ्य है और जैसा हम सभी जानते हैं कि हमारे सनातन धर्म की सारी की सारी मान्यतायें आज के विज्ञान पर एकदम खरी उतरती हैं।
अन्त में यही आग्रह रहेगा – पौधे लगायें , पानी रोकें , नदियों, पहाड़ों, जलस्रोतों, जंगल की रक्षा करें।
— गोवर्द्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’
